sneha

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जोगीरा4

जोगीरा4

अल्हरपन के कारण व्यवहार मे बदलाव देखने को मिलता है। इस तरह के बदलाव परिवारीक रुप से सही नही माना जाता है। इसलिए अपने जिवन साथी के मनोभाव को दुरुस्त करने के लिए ही इस तरह के जोगीरा को कहा गया है। प्यार करने की तीखी नजर अपने पर रहता है। कहा जाता है कि प्यार जितना गहरा होगा प्यार पर उतना ही पहरा होगा। चाहत बढ़ने के साथ ही शरीर के संवेदनशीलता भी बढ़ जाती है। इसका नियंत्रण भी जरुरी है। जोगीरा के द्वारा समाज मे ऐसे बिचार रखने वालो पर सिधा व्यंग किया गया है कि इस तरह…
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जोगीरा3

जोगीरा3

मुड़ - मुड़ कर देखने की क्रिया मुलतः भाव प्रधान कार्य को निरुपित करता है। जब व्यक्ति अपने भाव के अनुरुप व्यक्ति को अपने करीव पाता है तो वह उसको जानने की कोशिश करता है। इसी को लेकर वह बार - बार देखता है। जब वह पुरी तरह से आश्वस्त हो जाता है तब ही अगले कदम के बारे मे सोचता है। कभी पति ही अपनी पत्नी की परीक्षा लेने को उत्सुक हो जाता है। प्यार मे यदि शक का भाव दिखने लगे तो इसका निराकरण होना जरुरी है नही तो यह भाव उसे अंदर ही अंदर खोखला कर देगा।…
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जोगीरा 2

जोगीरा 2

काठ की नईया यह जोगीरा एक यौवन की उच्चश्रृखता को दर्शाता है। परदेश मे रहने वाले परदेशी को याद करती बिबी की मनोभावना को व्यंग के जरीये जिम्मेदारी का एहसास समाज को कराता है। उमंग उल्लाश का अपना एक गणित होता है जिसमे इसको साधना कठिन हो जाता है। होली का त्योहार के लिए लोग दुर दराज से घर को लौटते है। यह जोगीरा हमे कहता है कि मन की तरंग को समझते हुए होली के इस मिलन को सार्थक बनावे। हमारा मन को व्यंग के ये बाण तरंगित करता हुआ समाज मे एकरुपता को स्थापित करता है। आशा कि…
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जोगीरा

जोगीरा

एक भाई का किस्सा होली मे जबरदस्ती का मतलब होता है, एक दुसरे को उत्साहित करना जिससे कि वह आपस मे जुड़ सके। हमलोगो को व्यवहार मे रहते हुए किसी न किसी समस्या का सामना करना ही पड़ता है, इसका समाधान हमारे सामाजिक व्याहार से ही संभव है। हमारे नजरीया मे फर्क होने के कारण हम एक दुसरे से बिगलाव महसुस करते है। यह पर्व हमे उसी भाव को दुर कर एकात्म होने के बिचार को सामर्थवान बनाता है, जिससे कि समाज को बहुध्रुबीय होने से बचा जा सके। हमारा जुड़ाव का कारण आवश्यकता होता है, यदि आवश्यकता ना हो…
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निराशा की आग

निराशा की आग

निराशा की आग लॆख जीवन भी एक अजीव पहेली है। उम्मीदों का दामन थामे जब जिंदगी आगे बढ़ती रहती है तो फुर्सत कहां मिलता है कि इसके बिच किसी अनहोनी के बारे मे सोचें। आजकल का तो समय ही है कि अति क्षिण संभावना भी दिखे तो अपनी निगाहें जमाये रखो यानी सकारात्मक सोच को बनाये रखो। एक भौतिकतावादी मानव के मन के लिए यही सबसे बड़ी समस्या होती है कि उसे थोडी भी कष्ट की बात को सोचना पड़े तो वह अपना मुह मोड़ लेता है और जब अनहोनी होती है तो उसके लिए खुद को संभलना मुश्किल हो…
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पुतीन का कर्ज

पुतीन का कर्ज

पुतीन का कर्ज पुतीन के द्वारा कमाई जा प्रतीष्ठा मे एक और अध्याय जुड़ गया है। शक्तिशाली सम्राज्य के नायक का ये नया रुप जनमानस को टिस दे रहा है। मानवता को समझने का जो प्रयास संयुक्त राष्ट्र संघ के रुप मे स्थापित हुआ था आज वह खुद समझने मे लगा हुआ है। युक्रेण के युद्ध मे जो कुछ कमाई होगा उसका हकदार पुतीन ही होगें। क्योकि उनके उन्मादी बिचार पर ही मुहर लगी है। इसकी किमत इतिहास पुतीन से जरुर उसुलेगा। आज पुरे बिश्व मे एन्ग्री पुतीन के नाम से उनको सम्मान मिल रहा है। जवकी युद्द चल रहा…
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महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि लेख भगवान भोलेनाथ के बैराग्य को माता पार्वती ने अपने तपोवल की शक्ति से तोड़कर उनको अँगीकार कर लिया। भगवान ने जीव जगत वासी के लिए शायद यह लीला रची हो। लेकिन जनमानस के लिए आज भी उनका यह कार्य याद किया जा रहा है। कहते है कि पुजा तो गुण की ही होती है। माता पार्वती के आलौकिक दृष्टि मे शिव शक्ति के जो गुण दिखे हो। हम जगत वासी के विए तो उनके हर गुण महान ही दिखते है। काल तथा परिस्थिती के अनुरुप महादेव के शक्ति धारण तथा समस्या निवारण कि चर्चा समस्त ब्रम्हाण्ड मे चलती…
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सत्य कहां मिलेगा

सत्य कहां मिलेगा

सत्य कहां मिलेगा लेख सत्य के खोज मे निकला व्यक्ति वस्तुतः स्वयं को ही खोज रहा होता है। स्वयं को व्यवस्थित करने के लिए वह अपना राह तलास रहा होता है। भटकाव का कारण गुण की प्रखरता का नही होना होता है। गुण के प्रखरता मे कमी होने के कारण उसका समायोजन सही से नही होगा। जिससे की उसके सम्मान मे कमी होगी। इसी कमी को पुरा करने के लिये उसको तोड़ जोड़ करना परेगा। इससे उत्पन्न व्यवस्था मे वह उलझता चला जायेगा। उपलब्ध परिस्थिती का लाभ लेता वह इस कदर उलझ जायेगा कि एक दिन वह स्वयं को खोजने…
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अतिथि आये

अतिथि आये

अतिथि आये अतिथि का भी अपना एक गणित होता है जिससे उनका संयोग और बियोग बनता है। एक बार ऋषि दुर्वाशा अर्जुन के वन आश्रम मे पधारे। उनके एक भाई से भोजन का प्रबन्धन करने को कहकर अतिथि अपने साथी समेत वन मे ही स्नान को चले गये। इस बात की सुचना जब द्रोप्ती को हुई तो उनकी चिंतन बढ़ने लगी क्योकि घर मे सभी खाना खा चुके थे। फिर भी वह अपने भोजन के वर्तन को देखने गई। उसमे सिर्फ एक ही चावल था। इसी बिच भगवान कृष्ण अतिथि बनकर अपने भक्त के घर पहुँच गये। भक्त के भाव को…
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प्यार कौन करता है

प्यार कौन करता है

समय एवं परिस्थिति के साथ शारीरिक बिन्यास के अनुरुप व्यक्ति का जब समायोजन होता है तो उसका मानसिक अवेग भी एक महत्वपुर्ण भूमिका अदा करता है। इसके बाद व्यक्ति स्वयं को स्थापित करता है। यूँ तो समायोजन का कार्य निरंतर चलता रहता है। लेकिन एक मुकाम पर पहुँच जाने के बाद व्यक्ति का बहुत कुछ नियोजित होकर स्थायित्व कि ओर बढ़ने लगता है। एक अवस्था से दुसरे अवस्था (यानि किशोरावस्था से युवावस्था यथा) मे प्रवेश करने पर ज्यादा मुश्किल का सामना करना पड़ता है। प्रकृति के नियम के अनुरुप स्वतंत्र रहने वाले हर वस्तु को अपने संयुक्त होने की शर्तों…
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