गांधी जयंती

Gandhi Jayanti

Birthday poem

2 अक्टुबर के गांधी जयंती को अंतरराष्ट्रीये आहिंसा दिवस के रुप मे भी मानाते है। गांधी जी का भारतीये राजनीति मे आगमन ऐसे समय हुआ, जब भारत गुलाम था, तथा ये माना जाने लगा था, कि अंग्रेज को भगाना संभव नही है। वे लोगो के दिल मे बैठे इसी मिथक को तोड़ना चाहते थे, कि अंग्रेज अजेय है। उन्होने इसके लिए जागरुकता का अभियान चलाया। अंग्रेजो के बिरुद्ध लड़ी जाने वाली प्रारम्भिक लड़ाई छोटे प्रतिनिधि स्तर की थी, जिस पर अंग्रेज हावी था। यही विचारधारा समाज्य में भी फैल गया। गांधी जी इस मिथक को तोड़ने के लिए शांती और अहिंसा का पाठ पढ़ाया तथा इसके साथ ही उन्होने अंग्रेजो के प्रति अपना बिरोध भी जताया।

  जब एक बिरोध एक बिचारधारा बन जाती है, तो उसका समुल नाश करना मुश्किल होता है, क्योकि उसका स्थान व्यक्ति के दिल मे होता है। डर जब एक बार निकल जाये, तो व्यक्ति आगे का मार्ग स्वयं तलासने लगता है। परिणामतः शासक के लिए बहुत वड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है। सवसे बड़ा समस्या है, बाजार जिससे सिधा लोभ होता है। अन्य सभी प्रकार के लाभ के लिए एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना होता है।

  एक कृत्रिम व्यवस्था का बिरोध यदी प्राकृतिक व्यवस्था से किया जाय तो प्रकृतिक व्यवस्था का जित होगा। प्रकृति व्यवस्था को बनाने के लिए लोगो को एक दुसरे तक पहुँच बनाना होता है, इसके साथ ही एक स्वतंत्र व्यवस्था सुत्र मे बंधना होता है। जिससे की उसकी निर्भरता दुसरो लोगो पर कम हो जाये या पुर्णतः समाप्त हो जाये।  उसको समय के साथ होने वाले समस्या का हल निकालना होता है। जो एक सम्बन्ध तथा साधन दोनो का निर्माण करती है। इसके बाद लोगो का आगे बढ़ने की प्रबृती भी बनने लगता है। जो समय के साथ अपना अलग-2 रुप भी बना लेता है। एक बिचारधारा की प्रवलता दुसरे के दवाव को नष्ट कर देती है। गांधी अपने इस प्रयास मे एक हद तक सफल भी हुए।

    यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। समय गुजरने के साथ यदी कोई अवरोध भी खड़ा होता है, तो उसका हल आपसी सहयोग से निकलाना आसान होता है। विरोध की एक धारा बनने और बढ़ने लगती है। इसका स्वरुप तथा व्यवस्था अलग-2 होता है। यदि इसका सम्बन्ध एक व्यापक स्तर का हो तो नियंत्रण तथा कार्य सम्पादन बेहतर होकर एक आन्दोलन का रुप धारण करता है। यही कार्य गांधी जी के बिचार को पुरे भारतवर्ष मे महानता की ऊँचाई पर पहुँचा दिया।

  आज के भारत मे राजनीति का स्तर समाज को समझकर उसका मुल्यांकन कर रहा है, तथा लोग अपने अनुसार एक बिचारधारा को चलाने की कोशिश करता है। कृत्रिम बिचारधारा का स्तर व्यापक नही होता इसलीये समाज टुकड़ो मे बटता चला जा रहा है। आज भी गांधीजी के बिचार प्रासांगिक है, जब बैश्विक बाजार का महत्व काफी बढ़ गया है। स्वदेशी की बिचारधारा अत्मनिर्भरता को बढ़ते हुए स्वाभिमान को गढ़ता है। बहुआयामी समाज को एक सुत्र मे बांधने वाले बिचार को सब लोगो तक पहुँचाकर उसका पुर्ण रुप से एक सुत्र मे बांध करके राष्ट्र के ऐकता को सुद्धढ़ करने के कार्य मे आज भी गांधी जी के बिचार उपयोगी है।

नोटः- यदी यह लेख आपको अच्छा लगे तो इसके लिंग को अपनो तक जरुर पहुँचाये जिससे की उनका भी मार्गदर्शन हो सके। जय हिन्द।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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