खुद की तलाश

खुद की तलाश

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खुद की तलाश एक कठीन कार्य है, क्योकी लोग व्यवस्था की धारा मे जीये चले जाते है। उन्हें कभी खुद के लिए समय निकलता ही नहीं है, जिससे की वह देख सके की वाकई उसकी यात्रा का पड़ाव कहाँ होने वाला है। उसे लगता है, कि वक्त की इस अनमोल पल को रोककर व्यर्थ क्यो चिंतन करे। लेकिन व्यवस्था की अपनी सिमा होती है वह उसी के अनुरुप अपना कार्य करती है। य़दि आपके सामर्थ मे उसे समझने की क्षमता की विकाश है, तो आप वक्त की कठीनाईयो से आसानी से पार लग जायेंगे अन्यथा आपको बदले व्यवस्था मे जीना पड़ेगा।

लेखक इसी व्यथा को व्यक्त करता हुआ खुद की तलाश करता है। आज उन्हें यह मैका मिला है, लेकिन मुस्किलें बढ़ गई है। नयी चुनौतीयों का सामने करते हुए अपने स्वप्न को प्रतिबिम्बित करना एक कला है। जो इस कला को समझ लेता है, वह समय के साथ अपने को ढ़ालने का गुणी बनकर आगे निकल जाता है। जहां से उसे बिते हुए पल की यादे सदा उद्वेलित करती रहती है।

भारतीय ग्रंथो तथा शास्त्रो मे इस तरह की समय से निकलने के गुड़ दिये गये है। लेकिन वक्त की आपाधापी मे व्यस्त मानव के पास इतना समय कहां है, कि वह खुद को तलाश कर सके। हे मानव तुम्हारी आत्मा कालातीत है, तुम वक्त के राही हो, थोड़ा सम्भल लो फिर तुम खुद के साथ सही न्याय कर पाओगे। आज एक लेखक ने एक आवाज दी है, थोड़ा रुककर समझने का बिचार तो बनता ही है।

नोटः यदि यह कविता लेख अच्छा लगे तो अपनो तक इसके लिंक को जरुर भेजें जिससे की उसका भी मार्ग दर्शन हो सके। कोमेंट व़ॉक्स मे अपना बिचार जरुर लिखें जिससे की आपके द्वरा भी लोगो को प्रोत्साहन मिले। जय हिन्द

लेखकः शालु प्रसाद

सम्पादकीय लेख एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

4 thoughts on “खुद की तलाश

  1. बहुत ही सुंदर लिखी है सालु
    माँ गायत्री का आशीर्वाद सदैव बनी रहेगी तुम पर।

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