बन्धन

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यह शब्द लोगो को बहुत व्यथित करता है, क्योकी यह स्वतंत्रता की धारा मे आवरोध उतपन्न करता है। लेकिन यह यदि योगपुर्ण हो तथा समय के साथ परिवर्तनशिल हो तो लाभकारी हो जाता है। मन की स्वतंत्रता यदि तन को आधार मान ले तो ब्यक्ति का पतन तय मान लेना चाहिए। मन पर बन्धन का मानसिक दवाव एक शक्तिशाली हथियार है। अपने आपको समय के धुरी से बाँधकर रखना एक कलात्मक योग है। इसका सतत पालन करना व्यक्ति को कार्य दबाव से मुक्ति के मार्ग को आसान बना देता है। समय का कार्य के साथ समायोजन जरूरी है जिससे व्यक्ति की बिकाश की धारा नियंत्रित तरीके से वह सके। संयोग तथा बियोग की प्रक्रिया सतत चलती रहती है। इसका नियमित संयोजन बनाते रहने से बिकाश सदा चलती रहती है।

एक लक्ष्य को लेकर उसके बिभिन्न आयामो मे बांटकर कार्य कुशलता पुर्वक समय के साथ करते रहने से कर्म के सर्बोच्यता की प्राप्ति हो जाती है। हर समय का अपना एक जीवन काल होता है उसको उसी समय उसका आन्नद पाप्त करना अच्छा होता है। बन्धन हमारे लिए एक सुखद योग बनाता है। जिसके सहारे हम चलकर अपने लक्ष्य तक पहुँच सकते है। मानसिक शक्ति की प्रबलता हमे रास्ते को आसान बना देती है। हमे अपने लक्ष्य के प्रति कार्य मे संपादन की संकोच हमको असहाय बना देता है। लोकलाज, अपना स्वाभिमान हमे समाज के प्रती सहज होने से रोकता है।

मानव को बन्धन से पुर्ण मुक्ति संभव नही है। लेकिन धारा के साथ चलते रहने से बन्धन का
दुसप्रभाव नही पड़ता है तथा समय के साथ पुर्ण सहयोग भी बना रहता है। बिपरित स्थिति के होने के साथ बन्धन पर दबाब बनने लगता है तथा उसको व्याख्या की जरुरुत होती है। जिससे हम समय के साथ होने वाले परेशानी का कोई तोर निकाल सके। यहां हम कुछ बन्धन की बात कर रहे है जिससे की आपका मार्ग दर्शन हो सके।

  • समय का कार्य के साथ बन्धन

समय के साथ कार्य को करना कार्य की गति तथा उसके उपागम को सही निर्देश प्रदान करना कहलाता है। इसमे कमी से कार्य मे बाधा उत्पन्न होता है। समय का महत्व कार्य को स्रार्थकता प्रदान करता है। कार्य क्षमता को समय के साथ जोड़कर कार्य संपादन करना श्रेष्ठता कहलाता है। अनुभव समय तथा कार्य के बिच पुल का निर्माण करता है जो रास्ता को आसान बनाता है। सफलता चाहने वोलों का समय के साथ गठजोड़ का बड़ा महत्व होता है। समय से चलने के करण शरीर मन तथा दिमाग सही का सुत्र अच्छा होता है। सफलता चाहने वोलो को ऐसा ही करना चाहिये। कुछ लोग समय पहले तथा कुछ लोग समय के बाद सोचने का कार्य भी करते है जिसको समयोचित नही माना जाता है। कहा जाता है कि समय के साथ चलने वाला ही बिजयी बनता है।

एक योजना जो मन मे चलता है यदि वह समय के साथ बन्धन का हो तो मन को नियंत्रित करने का सुत्र मिल गया ऐसा मान लेना चाहीये। यही सुत्र हमें मार्ग दर्शन करता रहेगा। जो समय बित गया उससे हमारा बन्धन टुट गया। जो समय आने वाला है उससे हमारा बन्धन बनने वाला है। जो समय अभी चल रहा है उससे हमारा बन्धन है जो हमे कार्योन्मुख करता है। पथ पर्दशक मानने वाला यह बन्धन हमत्वपुर्ण है।

हमारी चोतना शक्ति को जागुत करने वाला यह बन्धन हमारे शरिर के आत्मा को एक शक्ति प्रदान करता है। बर्तमान मे चल रहे सारे कार्य के बिच से अपने को निकालकर एक बिजेता बनना की सोच बन्धन की नियंत्रन ले ही निकलता है। स्वतंत्र रहने वाला मन कही नही ठहरता है। इसलीये समय के साथ कार्य का बन्धन होना जरुरी है।

  • मन का कार्य के साथ बन्धन

मन ही कार्य के पुरा होने की गति को सुनिश्चत करता है। मन कि व्याकुलता कार्य के प्रति चित को अस्थिर बना देता है। चित मे समय तथा कार्य कि गति का मापन आसानी से होता रहता है जो हमे सबलता प्रदान करता है। हमारी सतर्कता का मानदंड मन की गहराईयो से निकलता है जो आत्मा को पुरस्कृत करता है। मन अपरीभाषित बृति है जो समय के अनुरूप जीवन मुल्य पर काम करती है तथा आत्मा का सारथी भी होता है।

कहा जाता है कि मन को मार लिजिये बस हो गया भजन। ऐसा इसलिय भी जरुरी है कि मन को एक बन्धन मिल जाये। जहां के बाद उसका फिर उसी बिन्दु पर आकर मिलना सुनिश्चत हो सके। एक सधे सब सधे सब सधे एक जाय। यहां भी मन के बन्धन की बात कही गई है। मन की चंचलता से हम सभी परिचित है। बच्चे मन की चंचलता को निरुपित करते है जबकि बड़े मन की चंचलता को चिंतन मनन के द्वारा साधित करके उसका क्रियांवयन करते है। यही संयोग बियोग का योग चलता है जो हमे परेशान करता है। बन्धित मन को एक दिशा मिल गई होती है जहां उसे सुमग मार्ग मिल जाता है। कार्य पथ पर चलने मे होने वाली कार्यउर्जा भी कम खपत होती है जिससे तनाव भी कम होता है।

  • कार्य का लक्ष्य के साथ बन्धन।

लक्ष्य कार्य की अंतिम बिन्दु है जहां पहुँचकर कार्य की गति मंद पर जाती है। यहाँ कार्य की दिशा तथा दशा दोनो का रुपांतरण हो जाता है जो कोई ज्ञानि ही समझ सकता है क्योंकि ज्ञान प्रकाश समय की धारा को प्रकाशित कर देता है। दोनो का बंधन सदैव बना रहता है जबकि हमारा मन ही चित को स्वार्थ के अंधकार मे धकेल देता है।

लक्ष्य हमे कार्य गति प्रदान करता है। लक्ष्य हमारी चंचलता को स्थिर रखता है। जिससे हम स्वयं पर नियंत्रन रख सकते है। हमे एक दिशा का ज्ञान हो गया ऐसा मान लेना चाहिये। लक्ष्य हमे कार्यबल भी देता है। घटती कार्य उर्जा लक्ष्य को समिप पाकर उत्साह से भऱा मन को गति करता है।

  • लक्ष्य को आनन्द के साथ बन्धन

आन्नद परम की प्रप्ति का संदेश है जो समस्त शरीर मे क्रियांवित हो जाता है। कार्य मे लगा पुरा शरीर एक शांति संदेश पाकर जो आराम कि चेतना को पाता है उससे हमे असिम आन्नद की प्राप्ति होता है। आनन्द एक संयोग नही है बल्कि व्यक्ति के साधना का फल है। साधना आपको एक लक्ष्य तक ले जाता है। आनन्द का अपना ही अनुराग है। बिध्न बिनाशक है यह योग। हमारा आनन्दित मन हमे बाधा को लड़ने के प्रति सचेत करता है। निर्वलता का बिकार नही आने देता। अनुमान का संयोग भी यही देता है। सक्षम की बात हम यही से करते है। आंकलन की बात करने की यदी ठहर जाये तो ये संयोग से बनता है।

  • निरंतरता का परम के साथ बन्धन

जीव आत्मा का समय के साथ उसके प्रारुप का रुपांतरण है जो समय के साथ आगे निकल जाता है तथा शरीर पिछे छुट जाता है। यह निरंतरता ही है जो सदैव चलता रहता है। हमारी यह यात्रा हमे यठेष्ठ बनाती है। हमरा सुख-दुख का हमारा यहीं बंधन है। प्रत्येक छन की एक कड़ी बनने वाला तथा इस कड़ी से माला बनाने की बात परम के साथ बन्धन को परिभाषित करता है। परम को तो कोई तोड़ नही है। परम निरंतरता की अंतिम बिन्दु है।

  • शरीर तथा आत्मा का बन्धन

शरीर का आत्मा के साथ बंधन माँ के गर्भ काल मे होता है। जो जिवन के समाप्ति तक चलता है। इस शरीर मे आत्मा के शक्ति का बिकाश होता है जो जिव के गुजर जाने के बाद समाप्त हो जाता। यहा शक्ति उसके देव लोक मे बने रहने का समय का निर्धारण भी करता है। बिना शरीर के शक्ति अर्जित करने की कल्पना बेकार है। शक्ति अर्जीत करने के लिए साधन की जरुरत है जो मानव के लिए शरीर के रुप मे प्राप्त होता है। शरीर का बन्धन भी एक सतत प्रक्रिय है। शरीर के साथ जुड़ा आत्मा का भी शक्ति इसे से परिभाषित होता है। आत्मा शरीर से ज्याद शक्तिशाली है। शरीर के साथ आत्मा का बन्धन मानव सामाज के नियमन के अनुरुप ही कार्य साधना को करके अपना शक्त को बुद्धी करता है। आत्मा शक्ति शरीर से छुटकारा पाने के बाद घटने लगता है। लेकिन कार्यकाल शरीर के कार्यकाल की तरह नही होता है। साधना का उपाय आत्मिय शक्ति के लिए बहुत महत्वपुर्ण है। एक बास्तविक घटना का बिश्लषन का मैका मिला। एक देव शक्ति जो अपना कार्य करने के लिऐ देव परिवार मे जानी जाती थी। एक नियत समय आने पर वह अपना कार्य संपादन मे स्थिर नही रह सकी। इस घटना के छः महीने बाद उनका जन्म फिर मानव तन मे हो गया। इससे यह पता चला की साधना का मार्ग ही हमे आत्मिय शक्ति का श्रोत है। यह बन्धन हमारे लिये बहुत महत्वपुर्ण है।

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