उत्साह

किसी भी कार्य को करने के लिए उत्साह की जरुरत होती है। उत्साह हमारे कार्यवल को पुश बैक सपोर्ट देता है, जिसके बाद हम कार्य के प्रति समर्पित हो जाते है। उत्साह एक मानसिक योग है जो बिभिन्न प्रकार के बिद्याओ के संयोग से बना होता है। हमारा सामर्थ तथा कार्य भार दोनो के बिच की कड़ी है। यह हमें यह बतलाता है कि हम समर्थ तथा कार्यभार के बिच कहां खड़े है।

हमारे शरीरिक मानडंड का पैमाना नियत होता है। हमे जो प्राप्त होता है वह हमारे कुंडली मे समाहित होता है। हमे इस कुडली को जागृत करने की जरुरत होती है। हमारा बातावरण इसमे एक प्रमुख अवयव होता है। क्योकि हम नित इसके प्रभाव मे रहते है। कहा जाता है कि उत्साहित व्यक्ति के सानिध्य मे रहने से व्यक्ति की कार्यउर्जा जागृत हो जाती है। निराश लोग की कुडली जागृत नहीं होने के कारण वह स्थूल होकर अपने को वाकपटुता के जरीये सही सावित करने लगता है।

व्यक्ति यदि खुद को समझ लेता है, तो उसका समायोजन आसान हो जाता है लेकिन यदि वह खुद को समझे वगैर दुनीया को समझने निकला है तो उसे कष्ट ही उठाना परेगा। पाकृत मे संयोग और बियोग के बिच कार्य उर्जा का प्रवाह सतत चलता रहता है। व्यक्ति को चितन मनन करके कार्य उर्जा को जागृत करना परता है। हमारा शरीर का वाहक मन है। मन के तरंग शरीर को उर्जावान करते है। लेकिन खुद मन स्थिर नही रहता है। मन की स्थिरता को बनाये रथने के लिए साधना की जरुरत होती है।

यानी उत्साह को जागृत कर कार्य संपादन के लिए जरुरी है कि आपके मन मंदिर मे भी उत्साह होना चाहिए। भारत मे बौधिकता का प्रवाह निरंतर चलता रहता है। इसी प्रवाह के कारण हंमलोगो को इतनी बिभिन्नता देखने को मिलती है। बौधिकता को स्वयं मे स्थान देना भी हमारे बिचार पर ही निर्भर होता है। इसलिए उत्कृष्ट संगती को बारीयता देना चाहिए।

बक्त के प्रवाह के साथ तिनका भी आसमान मे छलांग लगा देता है। दुर तक जाकर जब पुनः धरती पर लैटता है तो उसका स्थान नियत नही रहता है। क्योकी उसकी कार्य उर्जा उसके चिंतन का भाग नही था। वो तो भगवान के व्यवस्था का हिस्सा बनकर उसके व्यस्था को स्थापित करता हुआ चला गया। भगवान भरोसे चलने वाला भी बक्त की धूरी के सहारे ऩिकल जाता है। उसके सम्पुर्ण जिवन मे आशा की चाह रहती है कि शायद अच्छा हो।

हमारी चेतना हमे जागृत करती रहती है वह सतत वातावरण के संयोग मे रहती है। इसकी भाषा को भान होने के साथ स्वयं को उर्जावान करने के लिए मन को एकाग्र करना होता है जिससे की इसके प्रती हमारा नजरीया शसक्त हो सके। यदि यह योग हम पा लेते है तो हमारे कल्याण का मार्ग खुलने लगता है। हमे खुद को पाकृत के साथ समायोजन होने का ज्ञान स्वतः होने लगता है। इसके साथ ही हमारा उत्साह भी बढ़ने लगता है। हमे स्वयं के प्रती भरोसा भी होने लगता है। समय के साथ लोगो का सहयोग भी यथेष्ठ लगने लगता है।

उत्साह मन की एक बृति है जिसका संबंध हमारे की जागृत अवस्था से है। जागृत होकर खुद को जगाने की क्रिया करते रहना चाहिए। इसके लिए भी हमें पाकृत के सानिध्य मे जाना होगा। पाकृत मे फैली बिभिन्नताओ का यदि ध्यान करे अपने मन को इस भाव को जानने के लिए स्थिर करे तो हमारा समग्र कल्याण संभव होगा। हमारे उत्साह पुर्ण रुप से जीरो नही हो सकता है। चित को स्थिर करने के पाकृत के मजबुत आधार से अच्छा कुछ नही हो सकता है।

हे मानव यह जीवन अपने आप मे एक योग है जो पाकृत से समायोजीत है। तुम्हारे कल्याण का मार्ग भी यही से निकलता है। तुम नित के साथ जुड़कर स्वयं को उर्जावान करो तथा निराशा को अपने अंदर न आने दो। निराशा की दस्तक यह बतलाती है कि तुम्हारा कार्य उर्जा कम हो रहा है इसको जगाने की जरूरत है। निराश लोग भगवान के शरण मे जाते है जहां से उसका उर्जावान होने का अवसर प्राप्त होता है। वस स्वयं को भगवान के सामने सिर्फ स्थापिता करना होता है। वहां की उन्नत उर्जा आपको किर्यान्वित कर देगी। आपके भाव जितना शसक्त होगा उतना ही जीवन का मार्ग आसान होता जायेगा। उत्साहित बनो तुम्हारा समग्र कल्याण होगा। क्योकि भगवत्व की प्राप्ति भी उत्साहित को ही होती है। मंगलम।

नोटः आप अपने बिचार को प्रवाहित करने के लिए अपना संदेश यहां कॉमेंट बॉक्स मे लिखें। जिससे आपके उत्साह मे एक कदम समझा जा सके।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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  1. सम्पादकिय लेख के सहायता से पाठ योजना को समझने मे सहायता मिलती है, लेखन के नजरीया को समझने के बाद पाठ ज्यादा स्पष्ट हो जाता है।
  2. लेख खोजने की बेवसाईट पर दिये गये स्पेस मे आप अपना जानकारी के लायक पाठ खोज सकते है।
  3. अवसर और वक्त का बड़ा ही संयोग होता है जिसमे हमे स्वयं को ढ़ूढ़ना पड़ता है। इसको जानने के लिए लेख को पढ़े।
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