अवसर और वक्त

अवसर और वक्त

Q. अवसर और वक्त बार-बार दरवाजा खटखटाता है, यदि सोने वाले गहरी निंद में हो तो उसे कौन जगाता है।

  1. दुर्घटना,
  2. चेतना
  3. भगवान
  4. दोस्त
  5. कोशिश करना बेकार है।

उत्तर व्याख्याः-

अवसर हमेशा वक्त के साथ जुड़ा रहता है। वक्त निकलने पर अवसर की महत्ता समाप्त हो जाती है। अवसर एक जरुरत हे जिसको तलास रहता है जरुरत मंद का जिससे की उसका समायोजन समय से किया जा। जो जरुरत मंद संबेदनशील होता है, वह उसे प्राप्त कर लेता है। यहीं पर कुछ लोग पिछे छुट जाते है। कारण कई है लिकिन सभी कारण को सोने के शब्द से निरुपण किया गया है। गहरी निंद से तातर्य है अवसर के प्रति संवेदनहीनता या उसके प्रति पुरी तरह से निराशा। जानकारी है, करना चाहिये जानने के बाबजुद व्यक्ति को कार्य संपादन के प्रति रुचि का आभाव होता है। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि अवसर का प्रभाव उसके ऊपर कम है, या कोई दुसरा कारण है जो उसके उत्साह को कम कर दिया है। यदि समय के साथ बह प्रभावि कारक हट जायेगा तो वह फिर जरुरमंद की सुची मे आ जायेगा। यह कार्य उसके अचानक तब होता है। जव उसकी उसकी अवस्यकता जान पड़ती है, लेकिन उसका संबन्ध कार्य संपादन के लिंक से हट जाने से कार्य नहीं हो पाता है। फलताः उसे निराश हाथ लगती है। 

दुर्घटनाः- यह व्यक्ति को जगाता है, यानी की व्यक्ति को उस समस्या से सामना करना पड़ता है जो उसके दिमाग मे तो है वल्की व्यहार मे नही है। वह पुरी ताकत के साथ उसका मुकाबला करता है। फिर बह जरुरत के सही करने के लिए सहयोग की तलास करता है। जबकि वक्त के साथ अवसर निकल गया होता है। आज के समस्या का समाधान तो उस समय था जब अवसर आया था, आज के सामधान के लिऐ।

चेतनाः- यह एक अवस्था है। इसकी तिन अवस्था है। इस अवस्था मे व्यक्ति कार्य के प्रति निष्ठावान तो रहता है। लेकिन उसका चुनाव उसे अपने कार्य प्रमुखता के सुची से करना होता है। जिसका निर्धारण उसका जरुरत उसे करता है। जोसकी जरुरत भविश्य मे होना है उसे वर्तमान से सिचने की कला अवसर को पकरना कहलाता है। जो उसमे नही है, क्योकि वर्तमान जरुरत की गहराई किसी कारण बस उसे बहुत जरुरी मालुम नही पड़ाता है।

भगवानः- भगवान की प्राप्ती भी व्यक्ति को भविश्य की समस्या के लिये पहले से तैयार करता है ताकि वह अवसर को पकड़ सके। यदि चुक हो जाये तो वह उसकी भरपाई के कला को जान सके। उसका कार्य जगाने का नही लायक बनाने का होता है। जो साधना के मार्ग से निकलकर व्यक्ति को हासिल होता है। व्यक्ति उस गुण को हासिल कर लेता है जो उसके पास जन्मजात नही था। यही भगवान को पाना कहलाता है जिसके कारण वह अवसार तथा वक्त दोने का समायोजन सिख जाता है।

दोस्तः- दोस्त उसे समझाने की कोशिश कर सकता है, उसके अंदर की प्रकाष्ठा को निखार नहीं सकता। दवाव देने की एक सिमा होती है। वह कार्य के लिए प्रेरणा देता है, लिकिन उसके सही स्थान देना भी जरुरत मंद को ही होता है। कभी ऐसा होता है व्यक्ति कार्य के करता है लिकिन सिथिल होकर छोड़ देता है। दुर्धटना उसके मसतिष्क के उस भाग  जगा देता है जहां से उसको उस कार्य के प्रति चेतना जगृत हो जाता है और वह यथेष्ठ हो जाता है अवसर तथा बक्त को समझ लेता है।

कोशिश करना बेकार हैः- यह हो सकता है कि तब जब हमें प्रयत्न करने की सिमा दि गई हो, लेकिन यहां यह सिमा नहीं है। कहा गया है कि कौन जगाता है, यानि जगाने वाला कारण इतना ताकतवर होना चाहिये कि वह उसे जगाके ही दम लेगा यह ताकत दुर्धना मे होता है। वह उसे रुलाता है, पुरे प्रक्रिया की समीक्षा करवाता है, तथा आगे के प्रति उसको समवधान भी करता है। चेतना को जगाता है।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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