
बदलती जीवन शैली के कारण उच्च महत्वाकांक्षा की प्रबल भावना के कारण उत्पन्न होने वाली समस्या का समाधान कठिन हो जाता है। यदि उच्चतम प्रयास के बावजूद आशातीत सफलता नहीं मिलती है तो मन में कुंठा की भावना बढ़ने लगती है। इसी भावना की बढ़ती गहराई के कारण समस्या समाधानबकी कार्य ऊर्जा घटने लगती है जिससे समस्या बड़ी लगने लगती है। एक समय ऐसा भी आता है जब समस्या इतनी बड़ी लगती है कि लगभग असंभव प्रतीत होने लगता है जबकि उच्चाकांक्षा काफी उच्चित चुकी होती है। इसके बीच के अंतर तनाव को और बढ़ा देता है। बढ़ा हुआ तनाव व्यक्ति को मानसिक रोगी बना देता है। अब रोग ग्रस्त जीवन बोझ लगने लगता है।
बाझिल जीवन हर समस्या का समाधान एक सीमित दायरे में रहकर खोजता है जो कठिन मालूम होता है। यह कठिनाई उच्चाकांक्षा को त्वरित करती है। इसके बाद व्यक्ति की चिंतन काफी बढ़ जाती है। हर बार की चिंतन और एक जैसा समाधान पाकर व्यथित मन इस बंधन से आजादी चाहता है। यही चाहत आत्महत्या के प्रभृति को लगातार बढ़ाव देती है। इससे मुक्ति को चरितार्थ होने का समय उत्तम लगने लगता है और अंततः व्यक्ति सपने जीवन को अधूरा छोड़कर इस दुनिया से दूर चला जाता है।
जीवन की ये यात्रा अधूरी यात्रा को अगले जीवन में पूरा करना होता है। सीखने की आत्मा की प्रभृति जीवन को फिर से वरण करती है और आप i आहे की यात्रा को तय करने निकल परता है। यहां गुरु का सानिध्य और विश्वास कार्य करता है जो भटके मन को सहारा देता है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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