राधाष्टमी

राधाष्टमी
राधाष्टमी
Oplus_131072

रोधाष्टमी का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। राधारानी के जन्म दिन पर यह त्योहार उनके जन्मदिन के खुशी मे मनाया जाता है। राधारानी समाज के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत है। उनके त्याग को याद किया जाता है। बालापन की राशलीला के भागदारनी रही राधा कभी अपने लिए कुछ नही चाही बस कृष्ण के प्रेमाभाव को सजाती सवारती रही। जब कंश के बुलावे पर कृष्ण को जाना हुआ तो राधा ने अपने प्रेम को साध लिया और कृष्ण को समाज के लिए स्वतंत्र कर दिया। कृष्ण को समाज विरोधी कंश पर विजय मिली इस विजय को समाज ने राधा के प्रति उनके स्नेह को और बढ़ा दिया। समाज के इस विचार को लेखको चिंतको तथा प्रबुद्ध लोगो ने असाधराण धटना के रुप मे चित्रित किया। समाज के नजरिया से इस तरह के गुणकारी कार्य कोई असमान्य व्यक्ति ही कर सकता है। इस खास गुण के कारण आज भी राधारानी को याद किया जाता है।

भारतीय समाज ने इस भाव को उच्च आदर्श के रुप मे स्थापित किया। लोगो ने इस घटना तो दृष्टांत के तौर पे पेश किया। यह दृष्टांत ही समाज मे राधा रानी को कृष्ण से जोड़कर एक प्रतिष्ठीत समाज का हिस्सा बना दिया। कालांतर मे ये भगवान के रुप मे समाज मे स्थापित हुए। राधारानी के गुणकारी भाव को समाज के उच्च आदर्श के रुप मे स्थापित विचार को ही साराहा जाता है। इस कहानी मे वासना का स्थान नही है। इसमे त्याग मनोभाव, मनोबृति तथा अपने को आगे बढ़ने की ललक की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। सदिशो वितने के बाद भी लोगो के बीच राधा रानी आज भी वीराजमान है।

कृष्ण जी की समाज के प्रति निष्ठा तथा उनके कार्य मे सफलता ने समाज मे एक उच्च विचार को स्थापित किया इससे प्रभावति समाज ने कृष्ण को राधा से जोड़कर देखा और प्यार और निष्ठा को एक सुत्र मे बांधकर राधा रानी को कृष्ण से जोड दिया। राधारानी की त्याग आज भी समाज को उद्वेलित करती है। किसी के सफलता की अदभुत मिशाल की पटकथा लिखने वाली राधा रानी आज भी समाज के प्रेमी प्रेमिका का प्रतिनिधित्व करती है। वासना रहित प्यार ओर प्रेम की असिम गहरााई तक ले जाती है।

रुकम्णी कृष्ण की पत्नी थी। ऐसा माना जाता है कि कुष्ण रुकम्णी से शादी उसको भागकर ले जाकर की थी। लेकिन ये पुरी कहानी राजनिती से प्रेरित थी। कृष्ण के इस समय मे अपने राष्ट्र को बचाने तथा जड़ासंध से मुकबना करने के लिए एक युक्ती के रुप मे देखा गया। इस भाव से भलेही समाज के एक खास वर्ग को लाभ हुआ लेकिन इसमे त्याग की भावना कम थी। इसलिए समाज ने रुकम्णी को कृष्ण के पत्नी तक ही समित रखा। कृष्ण के बाललीला की ही पुजा होती है। कुष्ण के उपदेश को साराह जाता है। लेकिन उनके बाललिला मे कंश की मुत्यू बहुत ही महत्वपुर्ण घटना है। इसमे हिंसा की व्यपकता नही देखने को मिलती है। समाज को एक स्वतंत्र जीवन जीने के पाठ देने वाले कृष्ण समाज को सजग और सहज रहने की सलाह देते है। अपने माता पिता को कृष्ण के कारगार से मुक्त कराने वाले लीलाधारी कृष्ण और राधारानी समाज मे हमेशा के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनी रहेगी।

लेखक एवं प्रेषकः अमरनाथ साहु

संबंधित लेख को जरुर पढ़ेः

By sneha

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!