
अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस(International Day of the Girl Child)
बालिका की मान सम्मान की रक्षा के लिए समाज हमेशा से सतर्क रहा है। इसके बावजूद आये दिन किसी न किसी तरह की अनहोनी घटना की जानकारी मिलती रहती है। इसके लिए जिम्मेदार तथ्य की तलाश की जाती है और उसके सुघार के भी प्रयास चलते रहते है। समय और परिस्थिती एक समान नही रहती है। इसके लिए प्रारंभिक तैयारी को शुरुआत के साथ ही करने की जरुरत है जिससे की मार्ग मे आने वाली बाधा को दुर करने की हिम्मत और जजबा बनी रहे और कार्य उत्साह के साथ बिना घबड़ाये परिस्थिती का मुकाबला करते रहे और आगे बढ़ते रहे।
भारत मे बहन भाई को रक्षा सुत्र बांधती है जिससे की भाई को बहन की सुरक्षा के प्रति दिम्मेदारी का एहसास होता रहे। समाजिक भाव के ये विशेष पर्व व्यक्ति को जोड़ने का कार्य करती है जिससे की एक मजबुत ढ़ाचा का निर्माण होता है। इससे समाजिक बुराई पर काबू पाने मे मदद मिलती है। एकसाथ स्कूली शिक्षा के साथ बडे होते बच्चे के लिए जीवन के कुछ खास नियम को समझने का मौका मिलता है जिससे वे खुद को परिस्थिती का मुकाबला करने के लिए मानसिक रुप से तैयार होने लगती है। समाजिक व्यहार का यह नियम भी एक मजबुत आधार को बनाता है।
बालिका के लिए समाजिक स्तर पर भी कई तरह के नियम लागू है जिससे की उसको सामान्य जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। यातायात मे महिला प्रथम का नियम लागू है जिससे की उसको सहुलियत होती है और समाजिक सुरक्षा का ढ़ाचा मजबूत होता है। इसके बावजूद कुछ बिशेष परिस्थीती होती है जिसके कारण समान्य परिस्थिती बदल जाती है। इसके नियंत्रित करने के लिए समाज को जागरुक होना जरुरी है। यह विशेष परिस्थती संगठित अपराध को जन्म देता है जो किसी व्यक्ति विशेष के बस की बात नही होती है। इसके लिए समग्र प्रयास करने की जरुरत है जिससे की बालिका की सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।
11 अक्टूबर का खास दिन इस विषय पर विचार विमर्ष करने क उदेश्य से इसे बनाया गया है। समाज के हर तवके के लोग को अपनी सक्रियता दिखाते हुए बालिका के मान सम्मान के साथ स्वाभिमान की रक्षा के लिए संयुक्त प्रयास करने की जरुरत है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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