
अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (International Day of Non-Violence)
अहिंसा मानव को समझने के लिए बहुत बड़ी गुणात्मक पहलू है। जहां अहिंसा होती है वहां पर व्यक्ति को जीवित रहने के लिए अपनाये जा रहे सारे आयाम को समझने का मौका मिलता है। यही मौका जीवित जीव के संधर्ष को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने का मौका देता है। इस धरा पर जितने भी व्यक्ति आये और आ रहे है सभी एक दुसरे से भिन्न है। इस तरह से सभी व्यक्ति मे कुछ न कुछ खास विशेषता जरुर होती है। इसलिए सबको समझने की कला किसी व्यक्ति मे नही होती है। जबकि एक ऐसी बिधा को बनाने की चुनौती होती है की सबको समझ सके।
अहिंसा एक युक्ती है जिसके तहत व्यक्ति अपने अंदर समझने की शक्ति पैदा करता है। जिससे जीवात्मा स्वयं को उर्जावान बनाता है। हत्या करने वाला व्यक्ति स्वयं को बड़ा सावित करने के लिए किसी भी परिवर्तन का विरोध करता है जिससे उसके अंदर सुधार की प्रक्रिया बंद हो जाती है। यही से व्यक्ति को सिमित दायरे मे अपने को स्थिर रखना परता है। यह दायरा ही उसके पुर्ण विकास की दायरा को बंद कर देता है। प्रकृति के अंदर उत्तरजिविता का सिधांत है जिसके कारण वही जिवित रहता जो पाकृत के ज्यादा अनुकूल होता है। मानव ज्यादा समझदार है इसलिए उसको सामने वाले को समझना चाहिए नही की उसकी हिंसा करनी चाहिए।
अहिंसा का दुसरा पहलू है समाजिक समरसता को अपनाना। जहां समरसता होती वहां पर अहिसा होनी ही चाहिए जिससे की न्याय की व्यवस्था स्थापित हो। न्याय की व्यवस्था ही वो विसात है जिससे व्यक्ति सबलता को प्राप्त कर लेता है। इतिहास गवाह है कि जिसने भी ह्त्या को हथियार बनाकर खुद बड़ा सावित करने की कोशिश की उसको समाज ने किनारे कर दिया। प्राकृति का भी उदेश्य जीवन को समझते हुए अपने अंदर ज्यादा गुण को धारण करना होता है।
अहिंसा का तीसरा पहलू है भाईचारा के विश्वास को बढ़ावा देना। जहां हिंसा नही होगी वहां संधर्ष बना रहेगा और जहां संधर्ष होगा वहां खुद को बनाये रखने के लिए सतत उन्नत व्यवहार करने के लिए खुद को सबलता हासिल करने की प्रबृति बनी रहगी। यही प्रबृति अच्छे गुण के विकास को जन्म देती है। भारत ने अपने इतिहास मे बहुत सारे युद्ध देखे है जिसका अंतिम परिणाम विचार के साथ रहना ही रहा है। इसलिए शुरुआत से ही इसी भाव को प्रश्रय दिया गया कि जो भाव बाद मे सिखनी है वह भाव पहले से हि क्यो न सिखी जाय।
हिंसक प्रबृति के व्यक्ति को प्राकृति ही जन्म देती है। वह थोड़े समय के लिए ही जीता है। उसका उसके भविश्य का पता नही होता है। वह वर्तमान को ही सबकुछ मान लेता है। फीर उसे किसी भी किमत पर खुद को समर्थबान बनाने के लिए प्रतियोगिता मे आगे जाना होता है। इसके लिए ही वह हिंसा का सहारा लेकर आगे निकल जाता है। जो दिन जीता है इसी भाव के साथ खुद को उन्नत बनाता है। उसका ये छणीक जीवन की गाथा लोग तो समझते है लेकिन समय काल की गणना मे वो पिछे रह जाते है।
अहिंसा के पुजारी सदा से ही मानव समाज के पहले पसंद रहे है और आगे भी रहेंगे। उनकी ही गाथा गाई जाती है। इस धरा के उन्नत किस्म के दुसरे जीव भी अपनी जाती मे हिंसा नही फैलाते है। पेड़ पैधे तो एक अलग ही रास्ता निकाल लेते है। जीवन की इस सच्चाई को समझने के लिए हमारे धर्म ग्रंथ भरे पड़े है।
अहिसा दिवस का खास दिन इसी भाव को समझाने के लिए जगजागरण अभियान को बनाया गया है। जीवन के हर विधा को समझने और उसके भाव को जागृत करने के लिए प्रेरित मानव मन को इससे बड़ा गुण क्या होगा की वो प्रकृति को समझने के लिए अहिंसा को अपना रहा है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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