
विश्व डाक दिवस ( World Post Day)
डाक सेवा आज भी चल रही है। समान को आदान प्रदान करने के लिए इसकी जरुरत आज भी लोगो को उसी तरह से है जैसा पहले थी पर इसकी प्रकृति बदली हुई है। आज ऑनलाईन का समय है लोग ऑनलाईन समान मांगाते है जो कुरियर से आता है जिसे पहले डाक सेवा कहा जाता था। आजकल डाक बिभाग का कार्य भी यही कुरियर सेवा वाले लोग करते है।
पहले संदेश का आदान-प्रदान होता था जिससे की डाकिया का आना जाना लगा रहता था लिकिन आज इलेक्ट्रोनिक ने इसका स्थान ले लिया है। जहां पहले किसी संदेश को पाने के लिए कई दिन लग जाते थे वही पर आज कुछ सेकेन्ड मे ही संदेश प्राप्त हो जाता है। पहले और आज के संदेश की प्रकृति भी बदल गई है। आज हर घटना के पिछे एक विचार होता है जबकि पहले एक घटना क्रम के बाद एक संदेश होता था। इस तरह के संदेश अनुकरणीय होते थे। आज की व्यवस्था बदली जरुर है पर कई तरह के लाभकारी भी है और कई तरह से हानीकारक भी।
पहले डाक से संदेश के रुप मे आंतर्देशीय पत्र होता था। पोस्ट कार्ड लिखा जाता था। बैरण भेजने के लिए बीना टिकट लगा हुआ खत होता था जिसकी राशि खत पाने वाले से लिया जाता था। आज भी नौकरी के लिए खत डाक से ही आता है। कई तरह से बिशेष संबाद भी डाक से होता है लिकिन इसकी सेबा सिमित हो गई है। पहले डाक बाबू के आने पर चहल पहल बढ़ जाती थी की कोई दुर देश से अपनो ने अपना सामाचार सुनाया है। आजकल संदेश की भरमार होती है तो लगता है की कोई समान्य सी बात होगी।
डाक सेवा अपनी अहमियत खो रहा है जिससे लोगो मे तनाव बढ़ रहा है। खत लिखने और समझने की क्रिया का आज भी कोई तोड़ नही है। कार्य का होना और मनोभाव को जानने की क्रिया अलग होती है। घटना क्रम जैसा भी हो लेकिन व्यक्ति की देखने और समझने का नजरिया उसका अपना होता है। घटना क्रम एक सीख भी देता है जो उसके कार्य क्षमता को प्रभावित करता है। इस सच्ची अनुभूति की आदान प्रदान खत के द्वारा होता था जिससे व्यक्ति का जुड़ाव गहरा होता था। आजकल संबेदना गहरी होती है पर एहसास गहरा नही होता है क्योकि हर घटना की प्रतिक्रीया एक स्पष्ट नजरीया को समझने मे समय लगाता है।
डाक सेवा की शुरुआत 1874 मे स्विटजलैंड में हुई थी। विश्व डाक दिवस की शुरुआत 1969 मे हुई थी। अपनी विशेष बात को कहने के लिए आज भी खत लिखने की परंपरा है पर लोगो की उत्सुकता संदेश को तुरंत जानने की होती है। डाक सेवा की जागरुकता को बनाये रखने के लिए लोगो को आज भी लेखन कला का सम्मान करना चाहिए। खुद भी लिखने चाहिए और दुसरो को भी लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। डाक सेवा मे लगे हुए लोग आज भी सम्मान के पात्र है। हम उनके कार्य की सराहना करते है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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