तनाव जागरुकता दिवस

राष्ट्रीय तनाव जागरूकता दिवस
तनाव को दूर करना का उपाय साधना के मार्ग को अपनबाभी है।
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आधुनिकता के इस दौर मे तनाव एक आम समस्या बनती जा रही है। इसका मुख्य कारण अपने इच्छा को सही तरह से नही समझ पाने की समस्या है। स्वयं के मुल्यांकन करने के लिए एक निर्धारित पैमाना को अपनाना और उसके अनुरुप आगे करने की कठीन चुनौती का सामना नही करते हुए भटकने वाले रास्ते पर आने वाली मुश्किल को ही तनाव कहते है।

पत्येक व्यक्ति की एक कार्य क्षमता होती है। इसके अनुरुप वह आपने को यथेष्ठ सावित कर सकता है। उसी की अनुरुप उसको कर्य भी करने की जरुरत होती है। अपने इच्छा के दायरे को बढाते हुए यदी वह अपने कार्य क्षमता का विस्तार देता है तो उसके कार्य क्षमता प्रभावित होती है जिसके कारण उसका आगे बढ़ पाना मुश्किल होता है क्योकि बहुआयामी प्रतिभा के धनी लोग तो हर कार्य को करने मे सक्षम होते है लेकिन उसकी व्यस्यता ही उसके लिए कठीयाई का कारण बन जाती है।

अपने को एक सिमित दायरे मे रखते हुए कार्य को उच्च कार्य क्षमता के अनुसार कार्य करते हुए एक सफल व्यक्तित्व को बनाये रखकर खुद को संभालने से तनाव जैसे समस्य से निजात पाया जा सकता है। तनाव की प्रकृति ही समस्या समाधान नहीं होने को लेकरके है। समस्या के समाधाने के लिए जरुरी है जानकारी और जानकारी के लिए अवलोकन की प्रक्रिया होती है। अवलोकन ध्यानाकर्षण और भाव को एकाग्रिच करने के विधी की व्यवस्था है। इस तरह से यदि हम स्वयं को समायोजित करते हुए शांत चित के साथ कार्य करते है तो पाते है कि समस्या का सही समाधाने हो रहा है और तनाव से निजात मिल रहा है।

तनाव के दुर करने का दुसरा उपाय है ततकाल के लिए समस्या से दुर होना और मनःस्थिती को सही होने पर फिर से उसपर शांति से विचार करना जिससे की कार्य की गुणवत्ता पुर्ण विचार से हो सके और सही निर्णय तक समय से पहुँचा जा सके। तनाव को दुर करने के लिए स्वमुल्यांकन जरुरी प्रक्रिया है। इससे जरुरत ही सारी प्रक्रिया को सही समय से नियोजित करते हुए कार्य को करने की जरुरत को पुरा किया जा सकता है। इससे तनाव दुर हो जाता है। तीसरा है कार्य प्रवंधन की उच्च कार्य क्षमता इससे कार्य के समायोजन की प्रक्रिया पुरी होती है। यदी कार्य क्षमता नही भी है तो हम समय के अनुरुप सही व्यक्ति से सहयोग लेकरके कार्य को पुरा कर सकते है।

चैथा है स्वयं पर विश्वास और इसकी वुनियाद गहरी होती है। यहां से व्यक्ति अपने जरुरत के व्यवस्था के प्रति सजग और सहज होता है। वह अपने विवेकी दिमाग ओर प्रयत्नशीता के साथ कार्य को सिख लेता है और कार्य को संपादित कर लेता है। देर से सही लेकिन दुरुस्त होकर कार्य करता है जिससे उसके विकास की दिशा प्रभावित नही होती है। वह हतोतसाहित नही होता है वल्कि कर्मठ बनकर अपने कार्य को पुरा करता है और सही दिशा मे आगे बढता है। यही प्रबृति उसके तनाव नही बनने देता है। पांचवा है तनाव के विषय पर समुहीक विचार मंथन करना और एक युक्ति संगत प्रयास के साथ अपने तनाव को दुर करने के प्रयत्न् को करना जिससे की उसके कार्य क्षमता को एक नया आयाम मिल जाता है।

ऐन केन प्रकरेण कार्यवाधा को दुर करने की प्रबृति व्यक्ति के आत्मबल को बहुत प्रभावित करता है। इससे बचना चाहिए जिसके कारण व्यक्ति सतर्क और सहज हो जाता है। तनाव के घड़ी मे दिमाग को शांत चित के साथ कार्य के अवलोकन को गहराई से अनुभीति करने की जरुरत महसुस होती है। तनाव वो व्यस्था है जो व्यक्ति को बीमार बना देता है। वह मानसिक रुप से अपनी के संबहन को काफी प्रभावित कर बैठता है। जरुरत है कि कार्य को करते रहने और साधना के मार्गे को अनाने की जिससे की कार्य क्षमता कि उच्चता बनी रहे।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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By sneha

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