बनस्पति और पार्यवरण
वैस्वविक प्रतिस्पर्धा के बढने के साथ ही विकाश की होर सी लग गई है। विकाश की इस दिशा का निर्धारण आर्थिक स्तर पर किया जाना लेगा है। आर्थक लाभ-हनि के कारण बहुत सारे बातों के नजरअंदाज कर दिया जा रहा है। इस नजर अंदाज का प्रभाव दिखने भी लगा है। इस प्रभाव को आंकलन करने वाले तथ्य को ज्यादा महत्व नही दिया जा रहा है क्योकि इससे नुकसान का भाव आता है।
सबसे ज्याद प्रभाव जिसपर पड़ा है वह है हमारा वनस्पति लगातार इसकी संख्या घटती जा रही है। जितने पेड़ लगाये जा रहे है उससे ज्यादा काटे भी जा रहे है। बढ़ती जनसंख्या को सुविधा देने के नाम पर किया जाने वाला कार्य लोगो को नुकसान दे रहा है। कई प्रकार की विमारी जो पहले नही थी अब समाज मे आम बात होती जा रही है।
सड़क किनारे लो पेड़ लगे है और जो शहर के रोड के किनारे है उसपर पत्ते कम नजर आ रहे है लेकिन जो पेड़ शहर से दुर है उसपर पत्ते ज्यादा देखने को मिल रहा है। इसका कारण पानी के आंतरिक स्तर का निचे जाने के साथ बढ़ती हुई पार्यवरण की समस्या को जिम्मेदार माना जा रहा है। जब बनस्पति आपने को नही स्वस्थ्य नही रख पा रहा है तो जनमानस पर इसका प्रभाव परना तय है।
सरकार के दवारा किये जा रहे प्रयास ज्याद सफल नही हो पा रहा है। इस कार्य को व्यक्ति गत स्तर पर भी समझने की जरुरत है जिससे की समाजिक जाकरुता बने। समाजिक जागरुकता के साथ ये समाज की एक आवाज बन सकती है जो आगे चलकर वैश्वविक स्तर पर इसका प्रभाव दिखने लगेगा। समाज के अंदर चर्चा का विषय यदि इसको बनाया जाये तो एक बिचारशक्ति का प्रवाह सतत चलने लगेगा और एक स्वस्थय समाज का निर्मण होगा।
स्वस्थ्य समाज के निर्माण की निव ही हमारे जीवन को उन्नत बना सकता है जहां से सुख की एक अदभुत गाथा को महसुस किया जा सकता है। लम्बी आयू की चाह रखने वालो के लिए यह एक उपयोगी तथ्य हो सकता है। तो आईये हमलोग बनस्पति की सुरक्षा का संकल्प ले और नये समाज की स्थापना की लक्ष्य की ओर अपना कदम बढ़ावे।