विश्व विद्यार्थी दिवस

विश्व विद्यार्थी दिवस
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विध्या अध्ययन करने वाले को विध्यार्थी कहा जाता है। विध्या अध्ययन करने के लिए प्रारंभिक स्तर पर माता पिता ही पहला गुरु होते है।  इसके बाद स्कुली शिक्षा शुरु होती है। भारत मे अभी मेकाले पद्धती लागू है। प्राचीण भारत मे गुरुकूल शिक्षा पद्धती लागू थी। आधुनिक शिक्षा पद्धति मे पहले बस्तु की जानकारी ली जाती है फिर वास्तिविकता से परिचय कराया जाता है। पहले की शिक्षा मे वास्तविकता और ज्ञान दोनो साथ-साथ चलते थे जिसके कारण अवलोकन और अनुभूती का गहरा संबंध था लेकिन अब ऐसा नही है। पहले ज्ञान को लिया जाता है फिर अवलोकन होता है। इस प्रकार की शिक्षा से व्यक्ति को वास्तविकता से गहरा रिस्ता नही रहता है।

 वास्तविकता से रिस्ता रखने के लिए व्यक्ति को अनुभव की जरुरत होती है। इसके लिए शिक्षा ग्रहण करने के बाद अनुभव के लिए कार्य करना होता है। कार्य करते हुए व्यक्ति की कार्य की गहराई मालूम होती है। इस तरह से शिक्षा कई स्तरीय हो जाती है। शिक्षा की इस व्यवस्था के कारण कई विध्यार्थी की अभिरुची नही होती है। ख्याल करते हुए सिर्फ स्मरण के आधार पर पुरी व्यवस्था समझनी परती है। फिर समझे हुए को वास्तविकता के साथ जोड़कर नवीकृत होना होता है। कुछ विध्यार्थी को इस तरह की व्यवस्था से अवगत होने मे कठीनाई होती है। जिसका लाभ ये नही ले पाते है।

शिक्षा को ग्रहण करते हुए विध्यार्थी को स्वयं के उपर नियंत्रण रखना होता है। मनोभाव को एक दिशा मे एकिकृत करना होता है जिससे की उसका ध्यान एकाग्रचित हो सके और कार्य की पुर्णता हो सके। ऐसा नही होने पर ध्यान के भटकाव का सामना करना परता है जिससे अध्ययन मे बाधा आती है और विद्यार्थी अपने लक्ष्य से भटक जाता है। यही भटकाव उसके विकास की मुख्य धारा से अलग कर देता है। ध्यान की एकाग्रता को पाने के लिए साधना की जरुरत होती है। साधना का मार्ग गुरु की सानिध्य मे ही पुरा होता है।

साधना के पाने के लिए प्रतिबद्ध होना जरुरी है। साधना के लिए समय को कई टुकरो मे बांटना होता है। कार्य की योजना बनानी होती है। इसके पुर्णता के लिए स्वयं को कार्योचित व्यवहार को करना होता है। इसके साथ ही कार्य की समाप्ती पर कार्य की पुर्णता का विश्वेषन भी करना होता है जिससे की कर्म कौशलम का पुरा सामर्थ मिल सके। कर्म कौशलम ही विध्यार्थी को उच्च शिक्षा के लिए यथेष्ठा बनाता है।

कामवासना विध्यार्थी के मार्ग मे वाधा बनकर आती है। अनावश्यक कार्य मे व्यस्त रहना भी कार्य वाधा के रुप मे देखा जाता है। जरुरी कार्य को करते हुए सारे अन्य कार्य को छोड़ना परता है और अपने लक्ष्य के तरफ तेजी से आगे जाना होता है। आजकल की प्रतियोगिता का समय है जिसमे की एक समित संसाधन के लिए सबसे योग्य व्यक्ति की तलाश की जाती है। इस कार्य के लिए जरुरी तैयारी की जानी चाहिए।

विध्यार्थी के काल को सबसे उत्तम काल कहा गया है क्योकि इसी समय के जीवन को खास दिशा मिलती है जो आने वाले समय की रुप रेखा लिखता है और जीवन को एक अर्थ देता है। विध्या अध्य्यन के इस राह को प्रमुखता के साथ करते हुए जीवन के उदेश्य को पाना चाहिए। अपने प्रेरक भावना वाले मन को सदा एक दिशा मे लगाते हुए अपने लक्ष्य को पाये इसी उदेश्य के लिए 15 अक्टूबर के दिन को खास बनाया गया है।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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By sneha

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