
शिक्षक दिवस ( Teachers Day )
शिक्षा मानव विकास की रीढ़ है। इसके बिना उन्नत जीवन की कल्पना करना मुश्लिक है। पैराणिक समय मे गुरुकुल पद्धती से शिक्षा दी जाती थी। उस समय मे गुरु के अनुभव और उनके गुरु के द्वारा दिये गये ज्ञान का समावेश होता था। उस समय के परिस्थिती के हिसाव से उन्नत मानव समाज को बनाने मे सर्वश्रेष्ठ योगदान देने वाला विषय शिक्षा को ही मान जाता था। भोतिक और मानसिक प्रयोजनों के साथ लैकिक और परालोकिक जीवन के विभिन्न पहलुऔंको का गहराई से अवलोकन को अध्ययन करते थे। इस समय मे शिक्षा का मुल विषय मानव के व्यवहार के साथ उसके समाजिक जीवन मे सुधार लाना मुख्य विषय होता था।
आधुनिक शिक्षा पद्धति मुख्य रुप से व्यवसायिक शिक्षा पर आधारित रह गया है। शिक्षा को सुख के साधन को उन्नत बनाने तक सिमित रह गया है। आज का विषय व्यक्ति आधारित होता है जबकि पहले का समाज आधारित होता था। व्यक्ति आधारित शिक्षा जीवन समाज को बिभीजित करने के लिए लगातार प्रयासरत रहता है। आधुनिक जीवन के उन्नती के मार्ग को प्रसस्त करता आधुनिक शिक्षा भी उपयोगी है। आज मुल रुप से मेकाले पद्धति से शिक्षा दि जाती है। इस तरह की शिक्षा मे पहले विषय को समझाया जाता है उसके बाद उसके प्रयागिकता से परिचय करया जाता है। आज के समय को मशिनीकरन के आगे बथा दिया है।
शिक्षक एवं विध्यार्थी के बीच के संबंध मधुर हो जिससे सिखने और सिखाने की ललक दोनो मे बनी रहे। इस विचार को सतत क्रियांवित करते रहने के लिए आपसी संंबाद जरुरी है। विशेषकर शिक्षा ले अलग व्यवाहर के विषय को एक दुसरे से जोड़कर समझना जरुरी होता है। सारे लोगो की समझ और व्यवहार करने की प्रकृति एक जैसी नही होती है। इसलिए व्यवहारिक विषय के साथ जुड़ाव से एक मानसिक दवाव बनाने की जरुरत होती है। इस प्रकार व्यक्ति के अंदर सुचिता आती है। वह व्यवहारिक दृष्टोकोण से और आंतरिक विचार शक्ति दोने से मजबुत होता है तो शिक्षक और विद्यार्थी के रिस्ते मजबुत होते है।
पहले वच्चे घर से अलग रहते हुए शिक्षा ग्रहण करते थे। अजकल के व्यवहार मे बच्चे को मालूम होता है कि उसकी पास धर रुपी शक्ती है जिससे उसके मानसिसक व्यवस्था बदल जाती है जिससे उसके व्यवहार बदल जाते है। इस तरह के व्यहार से बचने की जरुरत है। पहला गुरु माता पिता होते है। दुसरा गुरु शिक्षक होते है। तिसरा गुरु जीवन साथी होता है जो व्यवहार के साथ जीना सिखाता है। चौथा गुरु समाज होता है जो जीवन दर्शन को आईने की तरह दृष्टा के समाने रख देोता है। बाद बांकी फैसला तो उसका होती है। यही पर उसका विवेक कार्य करता है। वह जितना ही सहसी और उदार होगा कार्य उतना ही स्थिर और अनुग्रहणीय होगा।
जीवन रौशन हो मार्गदर्शक और प्रेरक हो इसके लिए संयम और व्यस्था के साथ जीना होता है। इसके लिए गरु का मार्गदर्शन जरुरी है। शिक्षक दिवस इसी खास गुण को सिखने तथा खुद के अंदर बदलाब लाने के लिेए मानाय जाता है। ये दिन खास तौर पर भारत के पुर्व राष्ट्पति सर्वपल्ली राधाक्रष्णन को समर्पित है। उनके जन्म दिन पर इस दिवस को मानाया जाता है। एक शिक्षक के रुप मे उन्होने राष्ट्र के जिस पद को शुसोभीत किया उससे इस पद की गरीमा बढ़ गयी। आज ये जररुत है कि लोग अपने पद की गरीमा को बनाने के लिए खुद को आगे लाये। आज के बिषेश दिन इस विचार और चिंतन को समर्पित है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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