
युद्ध और सशस्त्र संघर्ष मे पार्यावरण के शोषण की रोकथाम के लिए संघर्ष ( International Day for Prevention the Exploitation or the Environment in War and Armed Conflict)
युद्ध का अपना गणित होता है। युदध के लिए एक लम्बा सफर तय करना होता है। युद्ध आपसी तनाव का अंतिम मुकाम है। एक दुसरे को निचे दिखाने, अपना प्रभाव जताने, एक दुसरे से आगे निकलने तथा अपनी उपयोगीता सिद्ध करने को लेकरके होने वाले खिंचतान के अंतिमा पराव का पराव युद्ध ही है। युद्ध मे जानमान की भारी क्षती होती है। इसमे कार्य करने की क्षमता रणनिती तैयार करने की कौशल तथा आपसी समान्जस्य बनाने की कला का अनुठा प्रदर्शन होता है।
विजयी होने वाले को भी युद्ध की बहुत बड़ी किमत चुकानी परती है। युद्ध के बाद कई दशक लग जाते है फिर से जीवन को सुचारू रुप से चलाने के लिए। युद्ध से अनुभव के बाद स्वयं को एक योग्य व्यक्ति के रुप मे स्थापित करने मे लगने वाला समय स्वयं को उर्जावान बनाने मे खर्च होता है। युद्ध के समय की स्थिती पुनः उसी स्वरुप मे कभी नही आती है। वल्की उसका विगरा हुआ रुप या बदलता हुए समीकरण के साथ फिर से आता है। योग्य व्यक्ति को मुंह की नही खानी परती है क्योकि उसके सक्रियता का यह एक परिक्षा की धड़ी होती है।
युद्ध के समय जिस वस्तु का नुकशान होता है उसकी भरपाई तो आसान नही है लिकिन आने वाली पिढ़ी के लिए एक अनुभूती भरा हुआ संदेश मिलना जरुरी है। युद्ध के समय चलने वाले सारे हथियार से पार्यावरण का काफी नुकशान होता है। चलने वाले हथियार घाचक प्रबृति के होते है। इसके बास्तविक मुल्य का पता लगाना कठीन है लेकिन आपसी तनाव के बाद अपसी समानजस्य की बहुत बड़ी किमत अदा करनी परती है।
प्राकृति के घरोहर मे बैठा मानव पाकृति का ही नुकशान करने लगता है। इसको रोकने के लिए 06 नवम्बर के दिन को खास बनाया गया है। आज के दिन युद्ध को रोकने के लिए अधिक प्रयास करने की पेरणा देता है। सबको ये जिम्मेदारी है कि युद्ध की स्थिती नही आने दे और सुख के मानडंड को पुरा करते हुए सुख सुविधा के साथ रहते हुए समाज के कल्यानार्थ कार्य करते हरे।
लेखकः अमर नाथ साहु
संबंधित लेख को जरुर पढ़े।
- युवा का युद्ध से गहरा रिस्ता होता है इसलिये संयम से कार्य करने की जरुरत है।
- युद्ध और धर्म को समझने के लिए स्थापित मानव मुल्यो का मुल्यांकन करना जरुरी है।