
कारगिल विजय दिवस (Kargil Vijay Diwas या Kargil Victory Day)
26 जुलाई 1999 को लगभग 60 दिनों की लड़ाई के बाद कारगिल की उँची पहारियों पर तिरंगा फहराया गया था। इस युद्ध में देश के कई वीर सैनिकों ने अपनी प्राणों की आहुती दी। उनकी बहादुरी के सम्मान मे ये दिवस मनाया जाता है। दुश्मन लगातार अपनी तैयारी जुटा रहता है। जिसकी फितरत ही युद्ध और छलावा की हो वो कभी शांत कैसे बैठ सकता है। कारगिल मे भारी बर्फावारी के कारण दोनो तरफ की सेना अपने शिविर की ओर वापस आ जाती है। दोनो देशों के आंतरिक विचार के कारण यह व्यवस्था बनी हुई थी। जैसे ही दुश्मन को ए आभास हुआ की भारत की राजनिति अस्थिर है वो इसका लाभ उठाने के लिए कारगिल की उँची चोटी पर अपना बंकड़ बनाकर अपनी व्यवस्था मजबुत कर ली। जैसे ही भारतीय सैनिको को इस बात की खबर मिली तो ऑपरेशन विजय अभियान चलाया गया और साठ दिन के लगातार युद्ध के बाद सेना को आखिरकार विजय हासिल हुई।
इस लम्बे समय का कारण दुश्मन को उंची चोटी पर अपना पोजिशन बनाना था। लेकिन ठोस रणनिति और सेना की व्यापक तैयारी और मजबुत राजनितिक सहयोग के कारण ये संभव हुआ। भारत देश के हर नागरीक अपनी तरफ से विजय की आश लगा रहा था। इस विजय ने जहां सेना को हौसला बढ़ाया वही पर दुश्मन को सबक भी मिल गया की उसकी हर चावबाजी का जबाव सही रणनिती और सही व्यवस्था के साथ दिया जायेगा। इसके बाद अब दुश्मन अगली हिमाकत करने से पहले कई बार सोचेगा।
नया भारत अपनी तैयारी को लगातार मजबुत कर रहा है क्योकि दुश्मन हमेशा से भारत की कमजोरी पर नजर रखता है। वह चाहता है कि एक बार यदी सिकस्त दे दिया तो भारतीय राजनिति धारासायी हो जायेगी और इसका फायदा वो उठाकर भारत को छिन्न भिन्न कर देगा। कारगिल का विजय दिवस हमेशा भारतीय वीर जवानों की शैर्य गाथा गाता रहेगा और ये संदेश देता रहेगा की दुश्मन की हर चाल का जबाव उसकी उसी भाषा मे दिया गया था और दिया जायेगा।
26 जुलाई के इस दिन को याद करते हुए हर भारतवाशी कौ गौरवांवित महसुस करने और सेना के मनोवल को बढ़ाने के उदेश्य ये इसको जनजागरण का विशेष दिन बनाया गया है। हमारी शैर्य गाथा हमे उत्साहित करती है और हमारे अंदर एक उच्च आत्मबल का संचार करती है। जो हमारे देश को एक मजबुत आंतरिक बल देता है जिससे दुश्मन के प्रति सख्त संदेश देने और कभी पिछे नही हटने की दृढ़ता को दर्शाता है। जय हिन्द
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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