अन्नदाता

अन्नदाता

Country poem

कहा जाता है, कि भारत गाँवों का देश है, यहां कि लगभग 80 प्रतिशत आवादी गाँवो में रहती है। ग्राम्य जीवन को वहाँ की शांती तथा सुखद वातावरण के लिए जाना जाता है। ग्राम्य जीवन के लोगों का मुख्य व्यवसाय या तो खेती है, या पशुपालन। बाँकी के लोग इस व्यवसाय से जुड़े हुए कार्यों मे लगे रहकर  रोजगार पाते है। समान्य जीवन यापन का सही समानजस्य आधार है।

समांतबादी प्रथा के टुटने के बाद मजदुरो को लेकर के सरकार सदा संवेदनशील रही है। उसके जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए कई प्रयास किये गये, तथा लगातार प्रयास चल भी रहें है। इसी क्रम मे मजदुर की समान्य मजदुरी भी बढ़ गई। लेकिन उनके काम देने वाली सवसे बड़ी व्यवस्था मे लगे किसान की स्थिती मे कोई परिवर्तन नहीं हुआ। फलतः समाजिक व्यवस्था बदलने लगी। मजदुरी बढ़ाने तथा लगात के अनुरुप आमदनी नहीं होने के कारण कृर्षि कार्य को चलाना कठीन हो गया।

मजदुर अब छोटे किसान बनने लगे। किसान की बड़ी-2 जमीन को वे खुद अपने स्तर से समझौता करके उपजाने लगे। इससे रोजगार घटा। उत्पादन पर प्रभाव पड़ा। क्योकिं अपने कार्य क्षमता के अनुरुप ही लोग जमीन को ऊपजा सकते है। कृर्षि की लागत को भरण पोषण तक उपजाने के लिए विवश होने लगे। इसका प्रभाव विस्तृत होने लगा।

वैश्वीक बाजार के होने के साथ राजनिती ने भी इसका नुकसान किया। किसान का समग्र उत्थान होने के बजाय कई प्रकार की रियायतों का दौर चला और चल भी रहा है। किसान लगातार निर्धनता की तरफ है। लोगों का पलायन होने लगा। फलतः कृर्षि कार्य पहले से कठीन हो गया।

वैश्वीक प्रतिस्पर्धा मे लगे लोगो का ध्यान मुल रुप से अपनी व्यक्तिगत आमदनी बढ़ाने पर लग गया। इसके लिए कई लोक लुभावन बिचार बजार को उलझा दिया। इन उलझनों ने लोगों का  ध्यान भटका दिया। जरुरत बढ़ती गई तथा व्यवस्था बिगरती गई। उँच नीच का भेदभाव बिषमता का कारण बनने लगा।

आज किसान को समग्र उत्थान की जरुरत है। जिसमें की उसका उत्पादन से लेकर बिक्री तक की पुरी पक्रिया का मुल्यांकन हो, और उसपर बिस्तृत शोध किया जाय, जिससे की भारतीय किसान की हालत मे सुधार हो। किसान की सारी जरुरते एक ही छत के निचे पुरी करने की व्यवस्था हो। समय के साथ व्यवस्था का बिकाश हो। कृर्षि के गैर जरुरी समान के निष्पादन से भी किसान को लाभ मिले इसकी व्यवस्था हो।

बाजार का मुख्य तथ्य होता है मांग तथा आपुर्ति। इन दोनो के बिच सम्बन्ध को स्थापित करने के लिये एक लिंक की जरुरत होती है। इस कार्य को या तो सरकार या कोई अन्य संस्था पुरा करती है। जिसका समुचित विन्यास नही है जिसके कारण किसान को काफी नुकसान उठाना पड़ता है।

भंडारण पर सही तरह से ध्याण देने की जरुरत है। इसका सही बितरण तथा समय के साथ सही बिकाश भी होना चाहिए। पुरी समस्या को टुकड़ो मे समने के कारण किसान को आज निराशा हाथ लगती है। नयी तकनीक का पुर्ण रुप से लोगो को प्रशिक्षण तथा समुचित जानकारी की जुरुरत होती है।

अन्नदाता के प्रति सरकार के द्वारा किये गये प्रयास असफल सावित हुये है क्योकि समय के साथ उनकी बढ़ती जरुरत को पुरा करने के लिए कृषि कार्य एक जोखिम भरा कार्य रह गया है। वास्तविक विकाश वहां हो जड़ चेतन से जुड़े लोग जहां हो। तव बिपरित परिस्थिती मे भी ओठों पर हाँ हो। जय हिन्द।

नोटः- यह लेख यदि आपको अच्छा लगे तो इस लिंक को अपनो तक जरुर भेजे, जिससे जागरुकता का एक पैगाम आपके तरफ से भी जाये और आपका भला हो। जय हिन्द।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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