वरदान का महत्व
भक्त और भगवान का बड़ा ही अनुठा संबंध होता है। भक्त भगवान के प्रति जितना आसक्त होता है भगवान के वो उतने ही करीव होता है। उसकी भक्ती उसको इस लायक बना देती है की वो हर परिवर्तन का मिल्यांकन कर सकता है। अपने इस गुण के कारण उसकी समझ अच्छी हो जाती है। वर्तमान जीवन के कठीन पल को वो आसानी से समझते हुए वो आगे निकलता चला जाता है। उसकी ये समझ उसको संतुष्टी देती है।
भक्ति के एक पराव पर भक्त और भगवान का प्रतक्षिकण होता है जिसमे भक्त भगवान को अपनी दृष्टि से देख सकता है और अपने जीवन के अनसुलझे पहलू का हल खोज लेता है जिससे की उसका पुरा जीवन सफल हो जाता है। उसकी कामना नर्मूल हो जाती है और उसका वांकी जीवन एक योग बन जाता है जिसमे वो अपने जीवन को मुल्यांकन करता हुआ भगवान को ही प्राप्त हो जाता है।
देवशक्ति माता भगवती आदि शक्ति है जिसकी पुजा पाठ पुरे विधी-विधान के साथ की जाती है। भक्त वतस्ल माता भगवती आपने सात बहन के साथ जनमानस के सुख और समृद्धी के लिए सतत ततपर रहती है। देव शक्ति की पुजा कई रुपो मे की जाती है। उनका जो रुप जनसाधारण के लिए दृष्यगत है वो है मानवी शरीर के भौतिक अवस्था जिसमे के समस्त गुण समाहित है। उनके इसी स्वरुप को व्यवहारिक जीवन के नियमानुकूल विधी समेत पुजा होती है। भक्त सुचित के साथ व्यवहार की उच्च मानडंड को स्थापित करते हुए देव माता को पुजा पाठ करते है। ऐसा करते हुए भक्त अपने परम धाम को प्राप्त हो जाता है। यदी कोई भक्ति मे चुक होती है तो भी उसे देव शक्ति की शरमगति प्राप्त हो जाता है।
देवशक्ति माता अपने भक्त को दिये तीन वरदान मे दो वरदान भक्त पुरा कर लेता है जबकि एक वरदान की पुर्ती आशा के अनुरुप नही होती है। भक्त इस बात को लेकरके बड़ा ही चिंतीत रहता है। उसकी यही चिंता उसको बरावर कोटचती है। भक्त के कामना और भक्ति शक्ति के प्रभाव से भक्त अपना दिव्य माता का आवाह्न करता है। देव माता की आवाह्न से दिव्य माता प्रकट होती है और भक्त अपने प्रश्न को देव माता के पास रखता है। भाव विहल देव माता बड़े ही ध्यान के साथ अपने भक्त की बात को सुनती है। देव माता बड़े ही विनम्र भाव के साथ भक्त को देखती है भक्त देवा माता के पास हाथ जोड़े अपने को पुरी निष्ठा के साथ कार्य करने की प्रेरणा को जगाता हुआ शांतचित खड़ा रहता है। माता अपने भक्त की कहती है कि
वार्तालाप
देवमाता – तुम वरदान का क्या अर्थ समझते हो
भक्त – वरदान का अर्थ होता है बिना किसी कठीनाई के वरदान मे दिये गये विषय की प्रप्ति हो जाना।
देवमाता – वरदान किसको दिया जाता है।
भक्त – वरदान भक्त को दिया जाता है।
देवमाता – वरदान भक्त को नही कर्मयोगी को दिया जाता है। यह देखा जाता है कि भक्त अपने नियत कर्म को निष्ठा के साथ करता हुआ अपने लक्ष्य की प्राप्ती कर लेगा उसे ही वरदान दिया जाता है। तुम्हारी कार्म के निष्ठा हो ही देखकर वरदान दिया गया था। तुम अपने कर्म पथ पर आगे बढ़ते रहो तुम्हे सब प्राप्त हो जायेगा। मेरा आशिर्वाद है तुमको।
भक्तः- देवमाता को हाथ जोड़कर अपनी कार्य को निष्ठापुर्वक करने की बचनबद्धता व्यक्त करता हुआ भक्त अपना शीश झुकाता है तो देवमाता अन्तर्ध्यान हो जाती है।
भक्त को अब ये समझ आने लगा की कर्म के बिना कुछ भी संभव नही है लेकिन नियत कर्म पर विश्वास की डोर को थामना मुश्किल होता है। देवमाता का साथ उसे सतत सचेत करता रहता है कि उसको आपने नियत कर्म मे ही स्थिर रहना है और अपने लक्ष्य की पुर्ती के लिए सतत आगे बढ़ते रहना है। भगवान भक्त की ये विशेष मुलाकात भक्त के नजरीये को बदल देता है। उसका हर कार्य अब एक युक्ति बन जाती है। अब हर कार्य उसके लिए पुजा बन जाती है। कार्य की अवधारण, चितन मनन, समय प्रवंधन तथा कर्म को कौशल के साथ करते हुए खुद को संतुष्ट महसुस करना उसके दिनचार्या मे शामील हो जाता है। इससे वरदान की दिशा मे एक महत्वपुर्ण कदम माना जाता है जहां से उसको अपने मंजिल दिखने लगती है। यही संतुष्टी भक्त का पारीतोशीक भी होता है। विश्वास का हर कदम उसे उसके मजिल तक जाता हुआ एक सुखद अनुभूति देता है, और अंततः अपने लक्ष्य पर पहुँचकर अपने आराध्य से कहता है देवमाता अपनी कृपा बनाये रखना भक्त अभी भी अपने पथ पर अग्रसर है।
वरदान का जीवन मे बहुत बड़ा महत्व है जीवन मे भटकाव के बहुत सारे मार्ग एक साथ आते है जो कि कभी भी उसको अपने मुल उदेश्य से भटका सकता है। वरदान उसको बांधकर रखता है क्योकि उसकी आस्था ही उसकी शक्ति बन जाती है। उसको लगता है की ओ हमेशा किसी के सानिध्य मे कार्य कर रहा है जहां से बच पाना कदापी संभव नही है। यही भाव उसे लगातार बांधकर रखती है और विकाश की उसकी प्रक्रिय पुरी होते हुए वह अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है और समाज के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत भी बन जाता है।
प्रश्न बहुत सारे उठते है जिसका समाधान जरुरी होता है लेकिन जो भक्त होता है उसको अपने भक्ती के दैरान ही बहुत सारे प्रश्न के जवाव मिल जाते है जिससे की वो ध्यान को लगाता हुआ सनमार्गी बनकर आगे बढ़ता है। मनोभाव को संयम और संतुष्टी से व्यवस्थित करता हुआ खुद को योगसाधना और नियम बद्ध करता है जिससे की वो वास्तविक विकाश की ओर वो अग्रसर रहे।
वरदान को पाकर खुद को सतत एक कर्मशील व्यक्ति के रुप मे स्थापित करने की जरुरत होती है। जब व्यक्ति एक सफल व्यक्ति बन जाता है तो उसकी जिम्मेदारी पहले से ज्यादा बढ़ जाती है। उसको चाहिए की अब भी वो जिग्यासु रहे और खुद को सिखने के लिए तैयार रखे जिससे की समाज की प्रेरणा को स्त्रोत बने रहे। ऐसा करते हुए वो अपने परमधाम को प्राप्त हो जाता है। क्योकि भगवान का परमधाम की वगिया जनमानस के क्लायण के लिए ही है यहां की पहुँच की शक्ति से लोग अपनो को जीवित समय मे ही जांच परख सकता है।
जीवआत्मा को इस शरीर मे ही सबकुछ समझबुझ लेना है जिससे की उसके अधोगती अच्छी हो आगे का जो समय है वह तो अर्जित शक्ति के सहारे समय व्यतित करने का होता है। जव समायानुकूल परिस्थिती आती है तो फिर जीवआत्मा अपने शक्ति को बढ़ाने के लिए शरीर धारण करता है। इस शरीर मे ही ओ सारे तंत्र मौजुद है जिसके सहारे भक्त खुद को मुल्याकन कर सकता है और अपने को एक योग्य व्यक्ति बना सकता है। लेकिन इसके लिए उसको सनमार्गी बनना होता है।
वरदान का महत्व हमारे जीवन को उपयोगी बनाने के लिए काफी है इस युक्ती संगत बात को समझते हुए भक्त को अपने निष्ठा के साथ कार्य पर लगा जाना चाहिए। साधना की शक्ति वहुत बड़ी ताकत है जो उसके जीवन मे निखार लाता है और वह समान्य जीवन के परिस्थिती से ऊपर उठ जाता है और अपने विवेकी जीवन से आसानी से कठीन परिस्थिती का समना कर सकता है।
सवका कल्याण हो, सबको देवमाता का आशिर्वाद प्राप्त हो, सब सनमार्गी बने और अपने साधना शक्ति से वरदान पाकर अपने जीवन के परम उदेश्य को प्राप्त करता हुआ अपने परम धाम को प्राप्त हो हम ऐसी आशा करते है। जय माता भगवती।
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लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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