जुड़सीतल

jursital

    बिहार के मिथिला मे प्रचलित जुड़सीतल पर्व बहुत पुराने समय से मनाया जाने वाला महत्वपुर्ण त्योहार है। ग्राम्य जीवन से जुड़े लोग मिट्टी को जुड़ाव को दर्शाते है। इस दिन एक दुसरे को गिली मिट्टी लगाते है और खुशी मानाते है। संयुक्त परिवार की चली आ रही परंपरा मे कुछ लोग ऐसे होते थे जो मिट्टी का कार्य से दुर रहते थे लेकिन पुरी गतिविधी मिट्टी से जुड़े कार्य की ही करते थे। इसलिए आपसी सौहार्दय को बनाने और समरसता लाने के लिए इस अनोखी परंपरा की शुरुआत की गई। ग्राम्य जीवन मे कृर्षि कार्य को करने वाले लोगो का अधिकांश समय मिट्टी से जुड़े कार्य मे ही बितता है। उनको मिट्टी से गहरा लगाव होता है। इस लिए एक दुसरे को मिट्टी लगाकर खुशी जाहिर करते है।

   मिट्टी की प्रमाणिकता को आज भी सावित किया जाता है यह शरीर के लिए आज भी लाभदायक है। हम जितने भी तरह के उत्पाद का उपयोग कर ले कुछ न कुछ खामीयां मिलेगी लेकिन मुलतानी मिट्टी का उपयोग लाभप्रद होता है। मिट्टी को बाल साफ करने के लिए भी उपयोग करते है। कहा जाता है कि यदि आप मिट्टी से जुडे है तो कोई आप हर मिश्किल हल कर सकते है। इसका मतलब की आप समस्या की हर पहलू को समझते है तो आप हर परिस्थिती से जुझ सकते है। ये कहावत भी किसान के दिल से उपजी हुई है।

  आजकल का समय बड़े ही तेजी के साथ बदल रहा है लोग नौकरी के पिछे भाग रहे है लोगो का जुड़ाव मिट्टी से दुर होता जा रहा है लेकिन जब विषम परिस्थिती आती है तो लोग फिर से मिट्टी के तरफ भागते है। कुल्लहर की चाय आजकल ज्यादा प्रचलीत हो रही है। मिट्टी के बरतन भी काफी उपयुक्त माने जा रहे है। हमारा समाज ने जो समाज को जोड़ने की परंपरा बनायी उसमे यही संदेश छिपा था कि कहीं भी रहो अपने मिट्टी से जुड़े रहो यही तुम्हे सुख और शांति देगी। तुम्हारी मिट्टी की खुशबु तुम्हे एक नया जीवन तथा नया हौसला और नयी सोच देगी तुम यहां आकर सुकुन शांती महसुस करोगे जो शहर की आवोहवा मे नही मिलेगी।

  ग्राम्य जीवन विकाश मे पिछे रह गया इसका कारण बैश्विक बदलाव है। जहां की चकाचौध ने लोगो को अंधा बना दिया है लेकिन आज भी मिट्टी के घर, मिट्टी के बरतन के पानी का कोई तोड़ नही है। इसमे रहने वाले लोग पहले काफी स्वस्थ्य रहते थे। वे प्राकृति के करीव रहते थे। आज की आवोहवा बदली जरुर है लेकिन हमे अपनी परंपरा को जिदा रखने की जरुरत है जिससे की हमारा संदेश हमारे आने वाले पीढ़ी को मिलता रहे और हमारा विजय पताखा सदा लहराता रहे।

   कुश्ती प्रतियोगिता तो मिट्टी मे ही होती है शरीर पर मिट्टी मलने के बाद ताकत का जोड़ देखते ही बनता है लेकिन अब तो नयी-नयी खेलों ने हमारी जिज्ञासा को बढ़ा दिया है और हमारा ध्यान इस तरफ से कम हो गया है। समाजिक जागृत और सजगता को दर्शाता ये जुड़सीतल का पर्व अत्यंत ही सुखद और उपयोगी है। किमती कपड़े मे लिपटा व्यक्ति चाहे जितनी भी खुशी की बाते करले जबतक मिट्टी की खुशवू उसके शरीर से नही लगेगी उसकी खुशी पुर्ण नही होगी।

  इस पर्व के सुवह मे परिवार के बड़े लोग छोटे को माथे पर जल देते है और कहते है कि जुड़े रहो, यानी आपसी रिस्तो की गहराई का एक अनोखा संदेश। आपसी तनाव को कम करता ये पर्व अनोखा है। इस समय पेड़ को पानी को जुरुरत होती है क्योकि पेड़ फल से लदे है तो पेड़ को पानी देने की भी परंपरा है क्योकि बड़े पेड़ को लोग पानी देना की बात भुल जाते है तो उन्हे यह कार्य पर्व के तैर पर करने की व्यवस्था होती है कि जिससे की उसकी जरुरत पुरी हो और फल अच्छे लगे।

  विज्ञान की सुझबुझ हमारी पर्व त्योहार मे छीपी है जिसको जागृत करने की जरुरत है। हम इसे भुलकर दुसरे के बहकावे मे आकर अपनी हानी कर लेते है यानी की अपनी खुशी दुसरे को दे देते है। हमारी मिट्टी की जुड़ाव हमे जीवन के सच्ची अनुभुती देती है। आज के दिन खास तरह के पकवान की व्यवस्था खुशी को बढ़ा देती है, विशेष कर कढ़ी-बड़ी तो बनाई ही जाती है। कुछ विशेष पकवान भी बनाये जाते है और खुशी मनाई जाती है।

  इस समय ही सुर्य उत्तरायण होकर बरुण मंडल मे प्रवेश करता है जिसमे विशेष प्रकार की हवा चलने की बात कही जाती है। इसके लिए हमे सावधान रहने की जरुरत है। खानपान को सही करने के लिए यह पर्व हमे सजग करता है। एक दिन पहले सत्तु खाने का विशेष प्रयोजन है जिसको सतुआनी कहते है। यह भी हमारे लिए उपयोगी संदेश है। हमे अपने भोजन को समय-समय पर बदलते रहने चाहिए जिससे की हमारा स्वास्थ्य सही रहे।

 इस पर्व की हम सभी को हार्दिक शुभकामनायें देते है और आशा करते है कि हमारी परंपरा हमारा मार्गदर्शन करती रहेगी और हमें एकता के ये सुत्र बांधे रहेगी।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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By sneha

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