धर्म और आस्था के आधार पर हिंसा के पीड़ीतो की स्मृति मे अंतर्राष्ट्रीय दिवस

धर्म मानव को मनावता का पाठ पढ़ाते हुए जीवन उत्कर्ष के सर्वोच्य शिखर पर आरोहरण करते हुए मानव समाज के उन्नती के कार्य को सिखाता है जो इहलोक और परलोक दोनो जगह पर अपनी कृति के लिए जाने जाते है। सदैव मंगलम का पाठ को पढ़ाता धर्म सदा अनुकरणीय होता है। धर्म ही मानव को कर्म की ओर अग्रसर करता है वरना वो शारीरिक मानडंड के आधार पर कार्य करते हुए स्वयं को समझने मे भूल कर देता है।

धर्म के मूल तत्व गुरु के द्वारा समझाया जाता है। सच्चे गुरु को धर्म की हर मूल तत्व का सिर्फ ज्ञान ही नही देते है वल्कि उसका प्रभाव भी अच्छी तरह से समझाते है जिसके कारण प्रभावित व्यक्ति का पुरा कल्याण होता है। ये कल्याणकारी भाव सबको एक साथ साधना के लिए उपयोगी होता है। गुरु के बाद गुरु की परंपरा चलने लगती है जो सिधांत की बात तो करते है पर भौतिक स्तर पर उनकी पकड़ कम होती जाती है। जिसके कारण आस्था की पकड़ बढने लगती है। ये आस्था अपने साथ समय के अनुरुप होने वाले बदलाव को समावेशित नही करता है जिसके कारण धर्म मे विसंगति आने लगती है। ये  विसंगतिया बड़ा होकर विद्वेश का कारण बनने लगती है जिससे धर्मानुचरण का आधार बनाकर लोग एक दुसरे से उलझ जाते है। ये उलझाऊ ही फसात का जड़ है जिससे की हिंसा का जन्म होता है।

हिंसा से पिड़ित व्यक्ति के अंदर एक हीन भावना का जन्म होता है जो आपसी विलगाव को और बड़ा कर देता है। ये विलगाव ही एक बड़े संधर्ष को जन्म देता है। मानवता का पाठ पढ़ाता बिभिन्न धर्मो के लोग इस विषय के मंथन के साथ इन लोगो के प्रति सहानभूति रखते है तथा एक उन्नत समाज के लिए कार्य करते है। 22 अगस्ता का दिन को इसी विषय को आत्मसात करने और एक उन्नत समाज बनाने के लिए प्रेरित करता है। हिंसा पिड़ित को मानवता का सहायता देना तथा शांति को स्थापित करना एक प्रमुख उदेश्य होता है।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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By sneha

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