
विश्व सदभावना दिवस
सद और भावना दो छंद से बना ये शब्द समान भावना या सत्य भावना को निर्देशित करता है। समान भावना के लिए एक जैसे विचार दर्शन के साथ जुडना होता है जिसमे की भाव का मिलन हो सके। यदि सत्य भावना कहे तो सत्य को स्थापित करना परता है। सत्य है पर यदि इसे गलत तरीके से स्थापित किया जाय तो भ्रम की स्थिती बन सकती है जिससे भावना मे बिखराव हो जाता है। सदभावना को बनाने के लिए कुछ विषय के साथ जुड़ाव का होना जरुरी है जैसे प्रेम, दया, भाईचारा और अच्छी भावना। इन सबसे जुड़ाव के बाद सदभावना का विकास हो सकता है। सदभावना से राष्ट्रीय एकता, शांति और सम्प्रदायिक सौहार्द को प्राप्त किया जा सकता है जो किसी भी राष्ट्र की स्थिरता के लिए जरुरी है।
इसकी जरुरत तब होती है जब समाज जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा या क्षेत्र की विशिष्टता को लेकरके आपसी मतभेद हो। किसी भी देश मे समाज किसी न किसी तरह से व्यवस्थित रहता है जो एक राष्ट्र की नीव बनाता है और उन्नती के मार्ग को प्रसश्त करता है। जब कोई खास व्यक्ति किसी निहित स्वार्थ मे आकरके एक खास तरह के लोगो को लाभ पहुचाकर दुसरों से अलग करने की विचार को संपादित करता है तो सदभावना बिगरने लगती है। इस बिगरती सदभावना का व्यापक असर होता है। किसी भी लाभ को पाने के लिए एक संयुक्त उपक्रम का विकास ही स्थाई विकल्प होता है जो सदभावना से ही आ सकता है। सुख पाने के लिए को छोटा रास्ता नही होता है।
सदभावना वो बीज है जो व्यक्ति को उसके विशिष्टा के साथ जोड़ता है और उसको परिवर्धित भी करता है। समय के साथ होने वाले बदलाव से उसको नवीकृत भी करता है। एक दुसरे के गुणात्मक पहलू के साथ जुड़ाव होता है। एक उन्नत समाज के लिए इसका बहुत बड़ा महत्व है। यदि समाज प्रबुद्ध है तो उसके भाव भी स्थिर होते है। यदि समाज संकुचित है तो भावना व्यक्तिगत स्वार्थ पर आकर रुक जायेगी तो सदभावना के भाव को चरितार्थ नही करेगा। यह जरुरी है कि इसके लिए सम्मलित प्रयास किये जाय जिससे की उन्नत समाज के साथ राष्ट्र की उन्नती और विकास हो तथा सुखी समाज के साथ एक बेहतर इतिहास की रचना की जा सके।
ये दिन विशेष रुप से पुर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती के उपलक्ष मे मनाया जाता है। भारत जैसे विशाल देश मे सदभावना को लगातार बल मिलते रहना चाहिए जिससे की राष्ट्रीय एकता बनी रहे। वैश्विक स्तर पर कई तरह के उलटफेर चलते रहते है जिसका असर देश पर होता है। इसकी आर मे कई तरह के ग्रुप सक्रिय हो जाते है जो सदभावना को विगार सकते है। इसलिए 20 अगस्त का खास दिन है जिसमे लोगो को इस विषय पर विचार विमर्ष करते हुए इसको मजबुत करते रहने की जरुरत है। स्वार्थ के स्तर को व्यक्ति अपने स्तर तक ही रखे और राष्ट्र को मजबुत विचार के साथ जोड़े रखे ये जरुरी है।
लेखक एवं प्रेषक अमर नाथ साहु
संबंधित लेख को जरुर पढ़ेः
- कभी ये कहना पड़ता है कि क्यो निकलते है अशक मेरे।
- भोगवादी समाज का दर्द बहुत दुखदाई होता है।
- जीत का दौड़ता घौड़ा उत्साह से भर देता है।
- किसी तनाव से दुर होकर विंदास पल को वितावे शांति मिलेगी।