महिला समानता दिवस

आज की दूनीया बाजारबाद को प्रश्रय देती है। यहां ऐसा माना जाता है कि सबकुछ बिकाऊ है। बस आपको बेचने आना चाहिए। इस सोच के कारण समय और परिस्थिती के अनुसार हर बस्तू की किमत लगायी जाती है और खरीदी तथा बेची जाती है। इस खरीद बिक्री कि क्रिया से स्वयं को उच्च समझने की भूल भूलैया मे व्यस्त बतलाया जाता है। इसके उपरांत मिलता है तनाव, भूख और अशांति। इसके बाबजूद यदि फिछे मुडकर देखे तो लगता है हम भौतिक स्तर पर दुसरे से ऊपर तो है हमे और आगे जाना है। इसी आपधापी मे महीला भी पिछे नही रहना चाहती है। उसको चाहिए पुरी स्वतंत्रता, दिन हो रात पुरी आजादी और उच्च व्यवस्था का साथ।

पुरुष प्रधान समाज मे जहां पर प्राकृत ने पुरुष और नारी के शारीरिक गठन और मानसिक समझ मे अंतर करके भेजा है आगे बढने मे समस्या आती है। मान सम्मान और प्रितिष्ठा पर किसी व्यक्ति विशेष का प्रतिनिधित्व नही रहता है। वह तो अंदर की समझ और कार्य करने की कुशलता से आती है। इसपर किसी व्यक्ति यद्धपी वो महिला हो या पुरुष उसका बरावर का हकदार है। यदि कोई व्यक्ति इस प्रक्रिया को बाधित करता है तो वह सजा का हकदार है। पर बात यही नही रुकती है जब सम्मान मिलने लगता है तो स्वभीमान जाग जाता है और व्यक्ति उच्चश्रिख हो जाता है। हर वस्तू के प्रति उसका अपना एक नजरिया होता है जिसके वो प्रभावी मानता है बाद बांकी सब उसके लिए कोई खास मायने नही रखता है। यही पर विषात खड़ा हो जाता है। पुरुष प्रधान समाज मे जब उसकी एक नही चलती है तो कहा जाता है कि समानता नही दिया जा रहा है।

हर समय एक समान स्थिति नही रहती है। बहुत सारे जगह ऐसा भी है कि लोग महीला को अपनी निजी संपत्ती मानकर आगे बढने ही नही देते है। उसका मनना है कि स्त्री बाहर सुरक्षित नही है। यहां उसकी मनोभाव महीला के विकास के सारे रास्ते बंद कर देते है। उसकी कार्य केवल गृहणी बनकर रहना ही उचीत माना जाता है। यहां पर इस तरह की सोच को बदलने की जरुरत है क्योकि आजकल संयुक्त परिवार बहुत कम ही देखने को मिलता है। जबकि एकल परिवार मे आर्थिक दवाब ज्यादा होता है तो लोग परिस्थिती से समझौता कर लेते है। लेकिन समय के साथ चलने की जरुरत है। विकास की प्रक्रिया मे सहभागिता के लिए स्वयं के निच विचार से उपर उठकर एक उपयुक्त व्यवस्था के साथ जीने की कला को बिकसीत करना होगा।

लोगो को अपसी समझ बनानी है और एक नया सुरक्षित समाज बनाना है। जिसमे की समानता का भाव हो किसी को हीन भावना का शिकार नही होना परे। सब पढे सब बढ़े के नारे को चरितार्थ करना होगा। एक नया संदेश देना होगा आगे बढ़कर लोगो को दृष्टांत देना होगा। सुधार की प्रक्रिया धिरे हो लेकिन उत्तम हो जिससे की एस उन्नत उन्नुख समाज का निर्माण हो जिसमे महीला की भागीदारी को प्रमुखता मिले।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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By sneha

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