राष्ट्रीय कुछ अच्छा करो दिवस

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा से संचालित होने वाले जीवन मे कार्य का एक क्रम हमेशा चलते रहता है। हमारा जीवन भी इसी उपाक्रम का भाग है। एक शरीर भी एक क्रिया विज्ञान है जिसमे लगातार क्रिया का क्रम चलते रहता है। इस क्रम को के आलावा शरीर संचालन के लिए जरुरी उपाय करने होते है जिसे भी कर्म ही कहा जाता है।

शरीर संचालन के लिए कार्य उर्जा की जरुरत होती है। ये कार्य उर्जा का प्रवाह निरंतर बना रहे इसके लिए आंतरिक मनोभाव और चंचलता जरुरी है। चंचलता के साथ कार्य उत्साह भी जरुरी होता है जिससे की व्यक्ति तरोताजा बना रहता है। वर्तमान घटना क्रम और आते जाते घटना क्रम के बीच एक संबंध होता है जिसका अवलोकन करने वाला दिर्ध सोची कहा जाता है। इसको लोग सराहते है और मानते है इनके विचार वर्तमान को बड़े ही स्पुर्त गति से करते हुए स्वयं को आगे रखता है।

इसी आगे रखने की क्रिया सबमे हो और सब लोग उच्च कार्य उत्साह और कार्य उर्जा प्रावह से साथ जीवन यापन करते हुए एक उच्च मानव समाज की स्थापना करे और जीवन उत्सकर्ष करते हुए आने वाले पिढ़ी के लिए मिशाल कायम करे इसकी अपेक्षा सबको रहती है। इस अपेक्षा को कार्य मे बदलने के लिए प्रेरणा लेने की जरुरत होती है। जिसके पास इस तरह के व्यवस्था की कमी है उनको अपने को ज्यादा दवाव डालकरा उत्साह से साथ अग्रणी बनने की दिशा मे आगे बढ़ना होगा।

आगे बढ़ते हुए यह ध्यान ऱखना होता है कि कार्य मानव समाज को उन्नती के लिए हो जिसमे हमारा सम्पुर्ण कल्याण हो। गीता मे कहा गया है कि मानव की खुद की सकारात्मक सोच और कार्य समाज निर्माण मे अहम भूमिका निभाता है क्योकि समाज का निर्माम व्यक्ति से ही होता है। अच्छा करने के लिए बस सोच को अच्छा रखना होता है। सोच अच्छी हो तो कार्य की दिशा मे अच्छी होती है क्योकि कार्य को करने के लिए मन की बृति एक जरुरी व्यवस्था है।

मन ही ओ दर्पण है जिसमे जीवन के सभी पल के गणक होता है। हमे इसी गनक को सही करना है और आगे जाना है। कार्य की दशा और दिशा हमेशा सही रहे इसके लिए कुछ अच्चा करने की विचार धारा को हमेशा मंथन करना होगा। इसी मंथन से कार्य उत्साह जागृत होगा और कार्य होगा। इसपर इसलिए जोड़ दिया जाता है कि मानव के शारीरिक विकार कमोत्तेजना, आलसी तथा अधिक भोजन करने की बृति जन्मजाता होती है। इसके सही करने के लिए स्वयं को आगे लाना होता है।

पाकृति के अंदर संयोग और वियोग को बनाते हुए जीवात्म को बीच मे रखा और मन दिया अपने कार्य को व्याख्या करते हुए स्वयं को प्रेरित करने के लिए। इसी कार्य के आधार पर अगले जन्म का निर्धारण होता है क्योकि कार्य से ही शरीर को उर्जा मिलती है और ज्ञान का दर्प खुलता है। इसी खुला ज्ञान दर्प से जीवात्मा अपने आत्मा के संस्कार को पाता है।

By sneha

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