
विश्व प्रकृति दिवस (World Nature Day)
हमारे चारों ओर पाये जाने वाले जितने भी दृष्यगत और अदृष्यगत बस्तु का घेरा है जो एक व्यवस्था के तरह एक दुसरे से जुड़े हुए है प्रकृत कहलाती है। हम भी इसी प्रकति के तरह एक उपक्रम है जिसमे जीवन है और हम एक दुसरे को समझ सकते है। अपने लिए कुछ नया करने की जजबा रखते है।
पाकृति को समझने के लिए खास तरह के परिवर्तन को हम लोग मुल्यांकन करते है जिसमे की वर्षा, हवा, पेड़ पैधे, ऋतु परिवर्तन, वायुमंडल तथा वो सारे घटना क्रम जिसे हम महसुस कर सकते है प्रकृति के तरह आती है। धरती के ऊपर जो भी बस्तु बिधमान है प्रकृति का हिस्सा कहलाती है।
हमारे अच्छे जीवन के लिए जो सबसे उपयुक्त है हम उसी की चर्चा करते है। हमारे शरीर के तापमान को बनाये रखने मे हमारे प्रकृति का बहुत बड़ा योगदान है। हमारे सांस लेने, भोजन करने तथा देखने, सुनने की सारी क्रिया प्रकृति के अधिन है। हमारा उदेश्य अपने लिए एक उच्च अनुकूल व्यवस्था को स्वतः स्फुर्त गति से बनने की प्रक्रिया को बनाये रखने मे अपना योगदान देना है।
मानव के विकास कि यात्रा ने मानव को काफी शक्तिशाली बना दिया है। जिससे मानव ने पाकृति को समझते हुए अपने लिए काफी उन्नत व्यवस्था को बना लिया है। इसके निर्माण मे पाकृति के स्वतः परिवर्तन के नियम का पालन नही हुआ है जिससे की इसके अच्छे के साथ खराब परिणाम भी मिलने लगे है।
वायु प्रदुषन भी इसमे से एक है। हमारी सांस लेने वाली वायू इससे प्रभावित होती है। जिससे हमारा आंतरिक शक्ति का हास होता है और हम बीमार परते है। जल प्रदुषन हमारी पीने के पानी की गुणवत्ता को प्रभावित होती है जिसके कारण भी हम बीमार परते है। मिट्टी प्रदुषण मे रसायन की अनियंत्रित मात्रा के कारण हमारे आहार प्रदुषित होते जा रहे है। बहुत सारे ऐसे उत्पाद बन रहे है जिसके कारण हमारा आसपरोस लगातार प्रभावित हो रहा है। इसका कारण पाकृति के नियम का लगातार अनदेखी करना माना जा रहा है।
पाकृति को समझते हुए जीवन को आगे बढाना काफी उन्नत प्रयास माना जाता है। हमारा परिवेश सुरक्षित रहता है तो हमारा मनोभाव भी सही रहता है। जिसके कारण हमारे सोचने और विचारने की शक्ति भी अच्छी रहती है। पाकृति को समझते हुए उतकृष्ट जीवन जीने की कला को विकसित करना होगा। ये समझना होगा की जीवन इसी पृथ्वी पर है क्योकी यहां की प्रकृति हमारे अनुकूल है। अबतक के ज्ञात सारे ग्रह खाली है क्योकी वहां की प्रकृति हमारे अनुकूल नही है।
हम यदी दुसरे ग्रह पर चले भी जाय तो जीवत नही रह सकते है क्योकि वहां की पाकृति हमे ज्यादा दिन तक हमारा साथ नही देगी और हमारा विनाश हो जायेगा। ये ग्रह अज्ञात वर्षो से खाली है और पता नही कबतक रहेगा। इसलिए हमारी जिम्मेदारी है की हम अपनी प्रकृति की अनुकूलता को बनाये रखे और यहां के जीवन के अनुकूलित पाकृति की सुरक्षा करे।
आजकल व्यक्तिगत स्वार्थ इतना प्रवल हो गया है कि एक देश दुसरे देश से आगे निकलने की होर मे पाकृति को अनदेखी कर बैठता है। यही अनदेखी भारी पर रही है। हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी ओर से सार्थक कदम उठाये और पाकृति की रक्षा मे अपने को आगे लाये। यही प्रयास एक दिन एक विचार बनकर सम्पुर्ण मानव समाज की रक्षा करेगा।
3 अक्टूबर का खास दिन इसी बिचार पर चितन मनन करने के लिए खास बनाया गया है। लोगो के जनजागरण का ये अभियान मानव समाज की सुरक्षा को मजबुत करेगा। हर विचार एक व्यवस्था को जन्म देता है जो एक मिशाल बनकर अधुरे कार्य को पुरा करता है। हमे आशा की हम सभी अपने इस प्रयास मे सफल होंगे।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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