
विश्व फार्म एनिमल डे (World Farm Animal Day)
बढ़ती खाद्धान की समस्या को दुर करने के लिए नये-नये तरीके अपनाये जा रहे है। जिससे की लोगो की खाद्धान की जरुरत को पुरा किया जा सके। मांसाहारी की बढ़ती मांग को पुरा करने के लिए फार्म का निर्माण किया जा रहा है। जहां पर सिमित जगह मे बहुत सारे पशु को पाला जाता है। जिससे की व्यवसायीक उत्पादन को पुरा किया जा सके। इसके लिए बैज्ञानिक व्यवस्था के साथ कार्य किया जा रहा है। लागत राशि कम हो और लाभ ज्यादा हो इसका ध्यान रखा जाता है।
इस प्रक्रिया मे त्वरित व्यवस्था के तहत आधुनिक विधी को अपनाते हुए कई तरह के अप्रकृतिक व्यवस्था का अपयोग किया जाता है। इसके बाद उत्पादित जनवर को जरुरत के हिसाब से उसका उपयोग किया जाता है। इसके पुरी व्यवस्था मे पाले जा रहे जानवर की स्थिती दैनिय हो जाती है। प्राकृति किसी भी जीवात्मा का जन्म और मरन अपने हिसाव से तय करते हुए जीव को उसके प्राकृतिक आवास पर रहने और अपने कर्म की पुरी छुट देता है जिससे की वो अपने कर्मो को सहारे जीवन को जीकर पाकृतिक व्यवस्था को समझे और उन्नत आत्मीय संस्कार को प्राप्त करे।
यहां जो व्यवस्था अपनी जा रही है वो पुरी तरह से व्यक्तिगत लाभ के लिए जानवर का उपयोग किया जाता है। जैसे मुर्गी को पालते हुए पहले उससे अंडे लिये के लिए सुई लगाई जाती है। अंडे देने के बाद उसके मांस का उपयोग किया जाता है। बहुत सारे जानवर है जिसका की उपयोग मांस खाने के लिए किया जाता है। मानव को सर्वाहारी कहा जाता है क्योकि वे अपने भोजन मे सभी तरह के वस्तू का उपयोग करता है। यही कारण है कि आज नये-नये बीमारी का लोग शिकार हो रहे है।
अपने निहित स्वार्थ के लिये जानवर का उपयोग बंद करने और उसके प्राकृतिक आवास मे रहते हुए पाकृत के साथ जनावर का उत्तम व्यवहार बनाने के लिए प्रेरित करने के उदेश्य से 2 अक्टूबर के दिन को खास बनाया गया है। इसको जनजागरण का अभियना बनाकर फार्म के मांस का उपयोग बंद करने की जरुरत है। प्राकृति जो भोजन हमे प्रदान किया है वो फल के रुप मे है जिससे की प्राकृति का संतुलन बना रहता है। हर जीव अपनी प्रकृति के हिसाब से जीता है और अपनी स्वस्थ्य मानसिकता को साथ पाकृति का वरण भी करता है जिससे प्रकृति मे सुंतलन बना रहता है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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