
विश्व पशु दिवस (World Animal Day)
पशु से हमारा लगाव बहुत पुराना रहा है। मानव ने जब जीवन को समझना सीखा था तो पशु से उसका रिस्ता हो गया था। कहा जाता है कि पहला जानकार जानवर कुत्ता था जो शिकारी के रुप मे मानव का दोस्त बन गया। इसके बाद न जाने कितने तरह के जनावर हमारे पालतु पशु के रुप मे अभी पहचाने जाते है। कुछ दुध के लिए कुछ मांस के लिए कुछ शैकिये तथा कुछ सिर्फ प्रदर्शन के लिए। इनकी एक लम्बी लिस्ट है।
कुछ हिंसक पशु जो हमारे लिए नुकसानदेश भी है बिशेष करके जंगली पशु या फिर वैसे पशु जिसको पालतू बनाना कठीन है जिसको किसी तरह के कार्य मे उपयोग नही किया जाता है वो भी हमारे परिस्थितीकी तंत्र का हिस्सा है किसी ना किसी तरह से हमारे लिए उपयोगी है। जो हमारे उपयोग आने वाले पशु होते है समान ढोने से लेकरके अनेक तरह के कार्य करते है। इसको पालने के लिए एक उत्तम व्यवस्था बनानी होती है। इस व्यवस्था के तरह तो कुछ पशु को बांधकर रखा जाता है। तो कुछ खुले मे रहते हुए भी सही व्यवस्था मे रहते है।
पशु को मारपिट नही करना उसकी सुरक्षा का ख्याल रखना। उससे कार्य क्षमता के अधिक कार्य नही लेना। उसको सही भोजन की प्रवंधन करना। उसको बीमारी होने पर उसका इलाज करना। कार्य के बीच उसको आराम देना। उसके शरीर पर हलके मसाज करना जिससे की उसकी हरारत उतर जाए। जानवर अपनी भाषा नही बोल सकते है। हमे खुद ही उसका ख्याल रखना होता है। जिसको जानवर से लगाव होता है वो उसकी संकेतिक भाषा को समझ जाते है और उसके अनुरुप वो आचरण करते है।
जानवर प्रेमी लोग बड़े ही दयालू प्रवृति के होते है। उनका लगाव जानवर के प्रति उनको बिनम्र बना देता है। वो अपने पशु का अच्छा ख्याल रखते है। इस तरह के व्यवहार वाले के साथ जानवर भी अपना व्यवहार अच्छा रखता है। कहा जाता है कि जनावर वफादार होता है जबकि इंसान धोखेवाज होता है। इंसान किए हुए उपकार को भुलकर समय का नाजायज फैदा उठा सकता है जबकि जानवर ऐसा नही करता है। बल्की जानवर समय आने पर रक्षक बनकर लाभ ही पहुँचाता है।
इसलिए लोग कहते है जानवर पालो इंसान नही। जहां रिस्ते की गहराई होती है वहां की प्रकृति कुछ और होती है। ये गहराई व्यक्ति की अपनी संपत्ती है जो सिखाने से नही आती है। आजकल कई तरह के जानवर पाले जाते है। कई तरह के हिंसक पशु भी पाले जाते है जैसे बाघ का बच्चा जो बड़ा होकर भी पालक के साथ व्यवहार को सही रखता है। ऐसा देखा गया है कि ये हिंसक पशु भी अपने रिस्ते को अच्छी तरह से निभाते है। इनका हिंसक व्यवहार भी इनके पालने वाले के साथ मृदुल हो जाता है। यही से लोगो को जानवर के प्रति विश्वास बढ़ा है।
इसके दुसरे पहलु भी है जो जानवर को सिर्फ भोजन की तरह उपयोग करते है। उनका उदेश्य सिर्फ जानवर को अपनी भोजन के व्यवहार तक ही सेवा करना होता है। फार्म मे पाले जाने वाले पशु की हालत दैनिय है। कुछ लोग पिजड़े मे रखकर जानवर को पालते है जिससे की उसकी स्वतंत्रता छीन जाती है। इस व्यस्था को लगातार विरोध किया जाता रहा है। इसके कुछ सार्थक परिणाम मिले भी है। यह प्रक्रिया आगे भी जारी है आशा है कि सार्थक परिणाम मिलते रहेगें।
पशु का उपयोग दवा को जांचने के लिए भी किया जाता है जिससे पता चले की दवा का क्या दुषपरिणाम होता है। इसके हिसाब से दवा मे बदलाव किये जाते है। आजकल इसपर रोक की बात की जा रही है। इसके जगह पर डमी का उपयोग किया जा रहा है। हलाकि पुरी तरह से अभी भी बंद नही हुआ है। इस तरह की प्रक्रिया को रोकने की जरुरत है।
जीव जगत हमारे लिए उत्सुकता का विषय रहा है। इसलिए मानव समाज ने काफी करीव से इसे समझने की कोशीश कर रहा है और आगे भी करता रहेगा। पशु के प्रति जो हमारा व्यवहार है वह उत्तम कोटी की हो जिससे की मानवीय भाव की मानडंड को उच्च किया जा सके। सार्थक प्रयास एक मिशाल बन जाती है।
जानवरो के साथ आपसी लगाव को गहरा करने की जरुरत है जिससे की परिस्थितिकी तंत्र की व्यवस्था सही रहे और हमारे पार्यावरण और वेहतर हो। इसी भाव को दर्शाने के लिए ही जन जागरण अभियान चलाया जाता है। 4 अक्टूबर का खास दिन इसी बिचार को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया है। लोगो को इसपर गंभिरता से विचार करने की जरुरत है जिससे की एक अभियान का रुप ले और उन्नत मानव समाज का निर्माण हो।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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