
महावीर जयंती
छठी सताब्दी ईसा पुर्व भगवान महावीर का जन्म हुआ था। इस समय छोटे-छोटे जनपद मे देश बटा हुआ था। इसी समय मगध जैसे गणराज्य का उदय हुआ। आपस मे समुदाय एक दुसरे से उलझे रहते थे। जिससे लोगो मे निराशा का वादल उमड़ने लगे थे। लोहा के व्यापक अपयोग के बाद एक बडे बदलाव की ओर लोग अग्रसर हो रहे थे। इसकी समय भगवान महावीर का आगमन हुआ। बिहार के बैशाली के निकट कुण्डलपुर ग्राम में चैत्र शुक्ल पक्ष त्र्योदशी तिथि को उनका जन्म हुआ था।
30 बर्ष की आयु मे भगबान महाबीर ने घर-बार छोड़कर आत्मज्ञान की खोज मे निकल परे। 12 साल के कठीन तपस्या के बाद उनको बिहार के गिरीडीह जिले के बराकर नदी के तट पर जम्भिक ग्राम मे साल बृक्ष के निचे ज्ञान की प्राप्ती हुई थी। महाबीर स्वामी जैन धर्म के 24 वें व अंतिम तिर्थंकर थे। उन्होने संसारिक माया मोह के त्याग के लिए ब्रम्हचर्य को अपनाया और इसकी प्राथमिकता दी। उन्होने अपने उपदेश को पांच प्रमुख तथ्य मे रखा। उन्होने अपने उपदेश मे सत्य, अहिंसा, अस्तेय यानी चोरी नही करना, ब्रम्हचर्य, और अपरिग्रह यानि धन संचय नही करना के विचार को प्रमुख माना।
आज के जीवन के आपाधापी मे भी महावीर स्वामी के दिये गये उपदेश प्रशांगिक है। जीवन के उच्च आदर्श को स्थापित करने और जीवन को एक कलात्मक तरीके से जीने के लिए ज्ञान की दरिया मे स्वयं को भिगोना परता है जो साधना से ही आता है। भौतिक जीवन के जिद्दोजहद से बाहर निकलने के लिए ज्ञान मार्गी रास्ता ही एक मात्र रास्ता है जो जीवन को गहराई से समझने मे मदद करता है। महावीर स्वामी के जीयो और जीने दो का सिधांत जीव को दुसरे से जोड़ाता है और जीवन के बिभिन्न् आयामो के समझने मे मदद करता है।
जीवन के बालापन और बृद्धावस्था बहुत ही कठीन काल होता है इसमे जीवन के खास भाव को सहेजने का समय होता है। बांकी के युवावस्था और पौढ़ावस्था का समय काफी हलचल भरा होता है। इसी समय मे लोगो को ज्यादा परेशानी झेलनी परती है। जीवन को काफी करीव से समझना परता है जिससे की जीवन को जीते हुए सुख और शांती को अपने सीमित समय मे उच्च प्राथमिकता के साथ जीया जा सके। इसमे माहवीर स्वामी के द्वारा दिये गये ये उपदेश काफी प्रशांगिक है। हमे आशा है की जीवन के सत्य की खोज करने वाले को उनके बिचार काफी अच्छे और उत्कृष्ट लगेगे जिससे की जीवन को करीव से समझते हुए एक उच्च आदर्श को स्थापित किया जा सके।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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