एटम बम 2022

एटम बम 2022

एटम बम 2022

तृतीय बिश्व युद्द के अंतिम दौर का समय चल रहा है। आपसी तनाव की बढ़ती दुरीया ने युद्द के कई मोर्चा खोल दिया है। तनाव तैयारी को जन्म देता है। तैयारी मौजुदा हालात के अनुरुप ही तय होता है। जब तैयारी का मानदण्ड पुरा होता है तो वातचीत की तल्खी बढ़ जाती है। इसके बाद आपसी नाप तौल का दौर चलता है। पुरी तरह से संतुष्ट हो जाने के बाद माहौल को अपने अनुकुल बनाने की प्रक्रिया चलती है साथ ही जरुरी उपाय भी करने शुरु हो जाता है। फिर प्रतिद्वन्दी की उलटी गिनती शुरु हो जाती है। इसके बाद जोर आजमाईस का दौऱ चलता है और अंततः युद्द की शुरुआत हो जाती है।

युद्ध की शुरुआती दौर मे दोनो पक्ष एक दुसरे पर हावी होने के लिए तय रणनिति पर आगे बढ़ते हुए एक दुसरे पर प्रहार करते है। फिर एक दुसरे के सहयोगी देश की भी मदद होने लगती है। मित्र देश से सुचना का आदान प्रदान होने लगता है। युद्द के लम्बा चलने पर एक देश दुसरे के प्रति खुद की ताकत के साथ नये रणनिति पर कार्य करने लगते है जिससे प्रहार की ताकत मे बृद्दी देखने को मिलता है। समय के साथ चलते युद्ध तो अब रणनिति के बनाने तथा उसपर अमल करने दोनो की जिम्मेदारी साथ साथ चलने लगती है। कार्य योजना को बनाना, लागु करना तथा उसका प्रतिउत्तर पर फिर बिचार करना। फलतः तनाव का अब नया दौर चलने लगता है। योजना की जल्दवाजी अनुमान के आंकड़े पर चलने लगते है जिससे की चुक होने की संभावना बढ़ जाती है जिसके कारण गुस्सा का दौर चलता है, जिसके चलते फैसले और गलत होने लगता है फलतः युद्द मे बर्वादी के दौर मे बृद्दि होता है। अब गुस्सा का गुव्वार इतना बढ़ता है कि एक दुसरे के अस्तित्व को ही मिटा देने की बिचार बनने लगता है।

मानव का स्वभाव है कि वह स्वयं को उच्यता की स्तर पर ले जाय तथा स्वमित्व का एहसास करे। जिससे की यश गाथा दुर दुर तक फैले। जिससे उसको रोज नये सामाचार का आगाज हो। वह इसी भाव को जीना चाहता है। यह चाहत भौतिकता की पराकाष्ठा है। इसी को पाने के लिए वह एक दुसरे की हस्ति मिटाने पर आमदा हो जाता है। भौतिकता की चाहत मानव मुल्यो का हनन करने लगता है। इसकी बिभिषिका का अंदाजा इससे हो जाता है कि मानव को संहार करने वाला शक्तिशाली अस्त्र एटम बम्ब का भी प्रयोग करने से लोग नही हिचकते है। उसका तनाव उसे ऐसा करने के लिए लगातार प्रेरित करता है। गुस्सा मे बिवेक कम हो जाता है। व्यक्ति एकाकी हो जाता है। स्वयं को वह सर्वशक्तिमान महसुस करने लगता है। उसके संकिर्ण होते रास्ते भी उसके सोचने की क्षमता को कम कर देता है। अपनो का दवाव भी बनने लगता है। इसके बाद वह जो कर गुजरता है उससे दुनीया शन्न रह जाती है। युद्द एटम बन्व के चलने के वाद रुक जाता है।

सुख भोगी मानव का मन बदलते देर नही लगती है क्योकि वह तो सुख की खोज को अंतिम छन तक यात्रा करेगा। सुख की यही चाहत उसे सिथिल बना देता है तथा दिमाग को तेज कर देता है। जिससे मानव समाज के धातक प्रहार करने वाला बम्व एटम बम्व का प्रयोग हो जाता है।

इसके प्रयोग होने के वाद आग की जो प्रवाल बनता है उसमे सबकुछ जल जाता है। युद्ध रुक जाता है क्योकि यहां के बाद की यात्रा व्यक्ति को बिस्मृत कर देता है। उसके सोचने समझने की शक्ति का पुरी तरह से हास हो जाता है। अब उसका दिल सिर्फ चलते रहता है दिमाग मे शुन्यता की स्थिति आ जाती है। समय के साथ हारने वाला देश चलना सिख लेता है। उसका दिल उसके भावना को पिढी दर पिढ़ी तपिस को बढ़ाता है जिससे फिर एक बार युद्ध की संभावना बनने लगती है। यह सिलसिला तो चलता ही रहता है।

हावी होने वाला अपनी मांग को थोपकर खुशी के आनन्द मे डुब जाता है तथा निर्भय पुर्वक अपने कार्य मे लग जाता है। शायद कोई नया शिकार फिर मिले। लेकिन अब जो भय का बातावरण वना होता है उसके लिए रास्ते आसान होता चला जाता है। बिरोध कम होने के चलते उसके कार्य़ क्षमता मे कमी आने लगती है। भोग बिलासिता का दौर जोड़ पकड़ने लगता है। उसका आनेवाला कल के प्रति उसकी पकर कमजोर होने लगता है।

इसके बिपरित हारे हुए लोग अपनी रणनिति को कठोरता से पालन करने लगता है। वह दुश्मन के प्रति अपने गुस्से को अगले पिढ़ी को देता है तथा उसमे उत्साह भरता है कि वह इस कार्य को आगे ले जाये। फलतः उसका मिसन आगे की ओर चलता है, और फिर तैयारी का दौर शुरु हो जाता है। समय की बेदी पर सवको जाना है। लेकिन हार जीत का मंच बड़ा ही सूहाना है।

मानव को ते एकदिन जाना है यह तो सवको मालुम है लेकिन भाव प्रधान इस संसार मे भौतिकता नगण्य हो जाता है जब भाव की प्रचंण्डता बढ़ती है। भाव का बनना हमारी कार्य उर्जा के निष्पादन को बढ़ा देता है जिससे कि व्यक्ति बिशेष अवस्था मे जाकर कार्य करने लगता है। यही से उसके नये दौर का युग शुरुआत होता है।

इसके अतिरिक्त दिव्य सुख को जानने वाले स्थिर हो जाते है। उनकी स्थिरता इतनी बढ़ जाती है कि शरीर के हलचल पुरी तरह से शांत हो जाता है। वह व्यक्ति अपने दिव्य एसहसास की दुसरी दुनिया मे चला जाता है। इससे मानव निर्माण की प्रक्रिया का सफल अभियान चलता है।

आज के युग मे जापान मे होरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका के द्वारा बन्व गिराया गया। इसमे जिस जानमान की क्षती हुई तथा इसके कारण हुए धातक परिणाम का बिश्लेषण आज भी किया जा रहा है। कहते है कि एटम बम्व से निकले रेडिएसन के कारण बच्चे अपंग पैदा हो रहे है।

महाभारत काल मे भी ब्रम्हास्त्र की प्रयोग के लिए गुरु द्रोणाचार्य तैयार हो गये थे। लेकिन ब्रम्हा जी ने उन्हे रोका। कहे कि इससे मानव जाति का भारी नुकसान होगा। ऐसा न करो। लेकिन गुस्सा से बाबला योद्दा ऐसा करने पर अरा रहा। हलाकि युद्द मे मिले प्रतिद्वन्दी के प्रति अपने पुराने गुस्सा को प्रकट होने से नही ने रोक पाये। तथा युद्द आगे निकल गया। लेकिन उसके पुत्र ब्रम्हास्त्र का युद्द के अंत मे प्रयोग कर ही दिया। तब भगवान कृष्ण ने अर्जून से ब्रम्हास्त्र चलाने को कहा यह स्त्रु का प्रतियुत्तर था। हलांकि गुरु ने दोनो से अंतिम मे शांति से काम लेने तथा इसके वापस लेने की वात कही। लेकिन अश्वथामा ने नही माना। जबकि अर्जुन ने अपना ब्रम्हास्त्र वापस ले लिया। जबकि वापस लेने का गुण अश्वथामा मे नही था। हलांकि भगवान कृष्ण ने अश्वथामा के ब्रम्हास्त्र को निःतेज कर सबकि रक्षा की।

एक बार रावण और राजदशरथ के बिच युद्द हुआ था। इसमे रावण ने ब्रम्हास्त्र चलाने को तैयार हो गया था। लेकिन आकाशवाणी के द्वारा ब्रम्हा जी ने रावन को कहा की तुम राजा दशरथ को कम न समझो। तुम लौट जाओ तुम्हे एक खुशखवड़ी मिलने वाला है। समय आने पर इसका निवारण होगा। फिर जब राम रावण युद्द हुआ तब भी मेधनाथ ने ब्रम्हास्त्र का प्रयोग किया था। लेकिन इसका तोड़ पहले ही निकाल लिया गया था। मेधनाथ का जब ये अस्त्र चुक गया तो वह यह समझ गया कि उसका अंत अव सुनिश्चित है।

लबकुश कांड मे भी दिव्यास्त्र का प्रयोग हुआ। लेकिन लक्षमण के हर प्रहार को निःतेज करने वाला काट पहले से ही लबकुश के पास था। युद्द मे बिजय की इतिहासिक गाथा को देखा जाय तो लगता है कि एक ऐसा अस्त्र जिसका कोई काट नही हो दुसरे के पास जित दिला सकता है।

जब अमेरिका ने परमाणु बन्व हिरोशिमा और नागाशाकी पर गिराये थे उस समय यह बन्व किसि के पास नही था इसलिए अमेरिका का निशचिंत था। लेकिना आज कई देशो के पास एटम बन्ब है। जिससे प्रयोग करने वाले देश की भी सुरक्षित रहने की गारंटी नही है। इसलिए इसके प्रयोग की बिकट संभावना को तलाशा जा रहा है।

वर्तमान युद्ध मे इस्तेमाल होने वाला हथियार तथा उसके बचाव के अध्ययन से यह जाहिर होता है कि कोई भी पुर्ण रुप से सुरक्षित नही है। इसलिए एक फिर आगे निकलने की होर चल रही है।

आपने देखा की युद्ध मे मेधनाथ का ब्रम्हात्र रोकने वाला लक्षमण लबकुश से हार गया। यह हार जीत दरअसल हमारे दिव्य शोध ऋषि के द्वारा बनाये गये हथियार थे जो उस समय के हिसाव से तौयार किये गये थे। बन्धुगण बास्तविक योद्धा तो हमारा ओ ज्ञान है जिससे हम कभी भी किसी से भी कही भी लड़ सकते है। वस हमे उसका ज्ञान होना चाहिए और एक तैयारी।

अब कई तरह के हथियार बन रहे है जो लेजर गईडेड है जो इस तरह के हथियार से सुरक्षा प्रदान कर सकते है। लेकिना एटम बन्व से जो मानवी त्रासदी आयेगी वह मानव के लिए वहुत ही दुखदाई होगा।

इसलिए हे मानव तुम अपने सामाज, देश, धर्म को बिजयी देखना चाहते है तो स्वयं से लड़ो। मानव कलायण के मार्ग ही सर्वोत्तम है। यही ओ परमेश्वर है जिसका कोई ओर अंत नही है। मानव की सच्ची सेवा ही तुम्हे युगो युगो तक याद करेगा। तथा तेरी यश और कृति पताखा लहरायोगा। भोग विलाश मे डुवे को यह योग समझाना संभव नही है। क्योकि उसका रास्ता तो युद्द ही है। यो वह रोज लड़ता है। इसकी का एक बड़ा रुप हमे कभी कभी दिखाई परता है। चाहे जो भी बिप्पती आये तुम तो सतकर्म करते जाओ तेरा सदा ही कल्याण होगा। क्योकि मानव कल्याण चाहने वाले का तो अहित हो ही नही सकता है। क्योकि उसमे स्वयं भगवान का वास होता है। फिर डरना कैसा। हे मानव आपके मानव कल्याण का मार्ग ही उत्तम है। आप इसको करते हुए ही मुक्त हो तुम परम धाम को जाओगे। ऐसा ही भाव युगो युगो से इस संसार मे तैर रहा है। हमसब इसे अपने दिव्य नेत्रो से देख भी सकते है। आपका जय हो।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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  2. तृतीय विश्व युद्द की शुरुआत का बिगुल बजते ही आने वाले खतरे को प्रती रणनिती बनने लगी तथा उसका समझा जाने लगाय़।
  3. युद्ध भूमी मे मां दुर्गा की पुकार करता एक भक्त को अतुलित शक्ति का एहसास होता है तथा वह पुरी ताकत के साथ दुश्मन का मुलाबला करता है और रण जीतता भी है।
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By sneha

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