
विश्व वर्षावन दिवस
वर्षावन स्वतः विकसित होने वाला वन है जो समय के साथ एक क्षेत्र को अच्छादित कर देता है जिससे की वहां की वन संपदा बहुत उन्नत हो जाती है। वर्षवन मे कई तरह के जीवन एक साथ विकसित होते है जिससे वहां की अवोहवा बहुत अच्छी हो जाती है। जल चक्र भी एक लम्बे समय तक उन्नत बना रहता है। लकड़ी से मिलने वाले लाभ की भी एकरुपता बनी रहती है। जहां वन पुराने होकर झड़ जाते है वही पर नये पेड़ खुद वो खुद निकल आते है। पार्यावरण की उन्नत व्यवस्था बनी रहती है जिससे की जीवन यापन की खुवसुरती बनी रहती है।
वर्षावन की इसी खुबसुरती के कारण वर्षावन की सुरक्षा की बात होती है। प्राकृतिक रुप से संरक्षण प्राप्त वन लम्बे समय तक लाभकारी बना हुआ रहता है। कृत्रिम रुप से बनाये गये वन बहुत दिनो तक सुरक्षित नही रहता है। इसके लिए भी वर्षा की जरुरत होती है जिससे की सुरक्षा चक्र स्वयं संचालित होता रहे।
वन के लगातार हो रहे क्षरण से पार्वारण पर बहुत बुड़ा प्रभाव परा है। विश्व के औसत तापमान मे बृद्धी हुई है जिससे की मौसम तेजी से बदल रहे है। इसके कारण जीव के आवास के साथ ही उसके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर परा है। तेजी हो रहे इस परिवर्तन को अनुकूल बनाने के लिए समग्र प्रयास की जरुरत है। वैश्वीक स्तर पर इसी बात को समझने और जनजागरण करने के उदेश्य से 22 जून को उपयुक्त माना गया है।
जीवन के हर क्षेत्र मे को सुंदर बना सकत है लेकिन सबको नियंत्रित करना संभव नही है। इसके लिए जरुरी है कि पार्यावरण की खुबसुरती बनी रहे और विकाश की धारा को एक निश्चित स्तर तक ही रखा जाय जिससे की स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव नही परे। जनजागरण की इसी अनुठी व्यवस्था से जो मानव को लाभ होगा वो आने वाले पीढ़ी को भी सुरक्षा प्रदान करेगा।
लेखक एवं प्रेशकः अमर नाथ साहु
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