
अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस
पुरुष प्रधान समाज में पति घर का प्रमुख होता है। घर की पूरी जिम्मेवारी पति के ऊपर होती है। आजकल एकल परिवार का चलन बढ़ गया है जहां पर पति की जिम्मेदारी और गहरी हो गई है। परिवार का सामाजिक परिवेश परिवार से ही घिरा रहता है जहां पर जीवन की सारी जरूरतें पूरी होती है।
पारिवारिक खर्च, बच्चों की देखरेख, रिश्ते नाते की जिम्मेदारी की सारी देखरेख पति के ऊपर हो होती है। पति को भारतीय समाज में परमेश्वर का दर्जा प्राप्त है जहां पत्नी की पूरा दारोमदार पति ही बहन करता है। पति के रहते पत्नी की सामाजिक स्वाभिमान उच्च कोटि की रहती है।
पति के अचानक गुजर जाने के बाद पत्नी को जहां समाजिक तानाबाना का सामना करना पड़ता है वही पर आर्थिक बोझ भी झेलनी पड़ती है। इसी आपाधापी के बीच पत्नी को जो परेशानी झेलनी पड़ती है उसका मानसिक प्रभाव बहुत गहरा होता है। इसकी पड़ताल करने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को एक खास दिन को चुना जिसमें विधवा सम्मान की उच्च सामाजिक व्यवस्था पर विचार करने की जरूरत है।
हमारा समाज जहां आधुनिक कार्यशैली को अपना रहा है वहीं व्यक्तिगत स्तर पर एक अलग विचारधारा रखता है। यही भाव विधवा को चिंतनशील बनाता है।
समाज को उन्नत बनाने के उद्देश्य से 21 जून को जनजारण अभियान चलाकर सारे विकार को समाप्त करते हुए विधवा सम्मान की उच्च आदर्श को स्थापित करना है।
लेखक एवं प्रेषक :अमर नाथ साहू
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