
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस
भारत के विभाजन की शुरुआत 1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा किए गए बंगाल के विभाजन से मानी जाती है। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो नीति के तहत संप्रदायिक राजनीति के बीज बोए। प्रशासनिक सुधार की आड़ में हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए बंगाल को बांटा गया। 1909 में मिन्टों मरले सुधारों के जरिए मुसलमानों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र तय किए गये जिससे अलगाव की भावना को बढ़ावा मिला। 1940 में मुस्लिम लीग ने आधिकारिक रुप से अलग मुस्लिम राष्ट्र (पाकिस्तान) की मांग का प्रस्ताव रखा। 1946 मे राजनितिक असमहमति और सीधी कारवाई दिवस के बाद से देश में सांम्प्रदायिक हिंसा बढ़ी। उस समय के कॉग्रेस के शिर्ष नेतृत्व जैसे जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने अंततः बढ़ते खून-खराबे से निपटने को रोकने हेतू विभाजन को एक अनिवार्य बूराई के रुप मे स्वीकार किया। 17 अगस्त 1947 को रेडक्लिफ रेखा के द्वारा देश का भौगोलिक और मानवीय विभाजन हुआ।
उपरोक्त घटना क्रम एक विचार शक्ति को लगातार हवा देने के लिए प्रयास किये गये जिसका अंत एक भयावह खूनी संधर्ष के बाद देश के विभाजन के रुप मे हुआ। इस बिभाजन ने ये स्थापित किया की हिंसा के जरीये हिन्दुस्तान को झुकाया जा सकता है। इसके लिए परोसी देश से लगातार हिंसा की साजिश किये जाते रहे। भारत एक शांति प्रिय देश है जहां पर अहिंसा परमोधर्मह कहा जाता है और इसकी शिक्षा धार्मिक और व्यवहारिक स्तर पर भी दि जाती है। जिसका असर समाजिक स्तर पर परता है। इसके कारण युद्ध को प्रति लोगो को नजरीया नरम रहता है।
परोशी देश के लगातार इस विचार को भारत की कमजोरी मानकर उकसावे की कारवाई होती रहती है। जिसका जवाव अव आधुनिक राजिनति ने ठोस स्तर पर देने की तैयारी कर ली है जबकी हमारा समाज आज भी उसी पुरानी विचारधारा पर आगे बढ़ता जा रहा है। इस भाव के कारण भारत का सर्वागिन विकास हो रहा है। जबकि परोशी साजीश मे ही उलझकर अपनी विभाजन की कवायत को झेल चुका है और आगे भी इसकी प्रक्रिया देखी जा रही है।
भारत के विभाजन की स्मृति इस बात की ओर इसारा करती है कि जनमानस मे हो रहे बदलाव के प्रति सतर्क रहने की जरुरत है। परिस्थिति धिरे-धिरे बदलती है और दुश्मन इसकी तैयारी लगातार करता है जवकि शांति प्रिय रहने वाले लोग अपनी विकास के प्रती लगे रहते है और वो गुलामी की जंजीर मे जकड़ लिये जाते है। भारत ने जब भी अपनी अवनति को पाया है उसका कारण बाहर के लोग ही रहे है जो की हमारे ही भाव से हमे ही हानी पहुँचाया है।
विभाजन को याद करते हुए ये विचार लिया जाता है कि भारत के और टुकड़े ना हो इसके लिए तैयारी समाजिक स्तर पर तो हो ही रास्ट्रीय स्तर पर भी इसकी तैयारी की प्रक्रिया को करते रहने की जरुरत है। समय और परिस्थिती कभी स्थिर नही रहती है। शोध और वैश्विक विकास की हलचल देश को प्रभावित करती है। हमे इसके अनुसार ही स्वयं को तैयार करना होता है जिससे की हम परिस्तिथी के साथ वेहतर समायोजन कर सके। आज के दिन को जनजागरण का अभियान बनाना है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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