
खुदीराम बोस शहादत दिवस (Khudiram Bose Martyrdom Day)
इसको बलिदान दिवस भी कहा जाता है। शहादत का दिन 11 अगस्त 1908 को था तथा उनका जन्म 3 सितंम्बर 1889 को मिदनापुर, पश्चिम बंगाल मे हुआ था। मुख्य घटना मुजफ्फरपुर में ब्रिटिश जज किंग्सफोर्ड की बग्गी पर बम फेकना था। यह घटना 30 अप्रेल 1908 को घटित हुआ। ये कम उम्र के स्वतंत्रता सेनानी मे से एक थे जिन्होने हंसते-हंसते देश के लिए जान दी।
देश के लिए कुछ करने का जजवा अंर्तरात्मा की आवाज से आती है। यह आवाज जब आती है तो व्यक्ति स्वतः स्फुर्ती गति से कार्य के तरफ आरुढ़ हो जाता है। उसका यही आरुढ़ उसकी आंतरिक शक्ति बन जाता है। फिर उसके कार्य करने का तरीका ही अलग होता है। वो अपने आने वाले समय के लिए स्वयं को तैयार कर लेता है। यही तैयारी उसकी जीवन बृति बन जाती है। यह स्वाभीमान के साथ जीने का सबसे अच्छा अवसर भी होता है।
खुदी राम बोस इसी संकल्प शक्ति के साथ जो कार्य किये उसकी याद सतत सारा देश करता रहेगा। वे भलेही आज हमारे बीच नही है लेकिन उनकी यादे हमेशा उनके होने का एहसास कराता रहेगा। देश के लिए सबकुछ बलिदान कर देने वाला महान आत्मा को सदा देशवासी याद करता रहेगा और ये संकल्प लेता रहेगा कि देश प्रथम है। बाद मे जीन्दगी की कोई किमत है। देश ही हमे जीने का नया आवसर प्रदान करता है। गुलामी की लम्बी जंजीर को झोलते हुए हमने जो सहा है उसकी गहराई से हमारा आत्म विश्वस मजबुत हुआ है और हमे सतत प्रेरित भी करता रहता है।
खुदी राम बोस की गाथा एक बीर निडर व्यक्तित्व की है जिन्होन बिट्रिश हुकूमत के ताना बाना को स्वीकार नही किया और स्वयं को न्याय पाने के लिए निकल परे। देश आज उन्हो याद करते हुए उनके प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करता है। 11 अगस्त का दिन ये प्रेरणा देता रहेगा की देश के लिये जो कुछ भी करना परे करने के लिए तैयार रहना चाहिए उसके लिए कोई उम्र की सीमा नही होती है। जन जानगरण का ये दिन आने वाले पिढ़ी को लिए एक संदेश लेकर आता रहेगा और उन्हे प्रेरित करता रहेगा।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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