
मजबूरी
जरुरत और व्यवस्था में समानजस्य नही होने से समस्या उतपन्न हो जाती है। यदि व्यवस्था को सही करने की हमारी कार्य क्षमता नहीं है या इसमें समय लग सकता है तो हम ततकाल अपनी जरुरत को पुरा करने के लिए जिस मार्ग का अनुसरण करते है और वो हमारी सोच मे नही है तो हम इसे मजबूरी की संज्ञा देते है। हम कार्य कर तो रहे है लेकिन मजबुरी में यानी इसम हमारी व्यवस्थित सोच जैसी उत्साह नही रहती है। इसके फलस्वरुप समय के साथ जो व्यवस्था बनती है उसमे हमारी आदत बन जाती है और हम उसी के अनुरुप व्यवस्थित हो जाते है। इस तरह की लगातार समस्या हमारी कार्य और सोच दोनो के नियंत्रित करती है। समय के साथ हम अपने कार्य क्षमता के अनुरुप ढ़लते चले जाते है। यही हमारा स्वभाव बन जाता है और यही स्वभाव हमारी एक पहचान बन जाती है।
यदि हम समय के साथ अपनी कार्य क्षमता को अर्जित कर लेते है तो हम देर से ही सही लेकिन अपनी कमजोरी पर विजय को पाकर खुश हो जाते है। पुरी प्रक्रिया मे विश्वास हमारा बहुत महत्वपुर्ण भूमिक अदा करता है। विश्वास हमारी नजरीया और हमारी कार्य के प्रति निष्ठा से तय होती है।
हमारी नजरीया यदि आने वाले समय को देख सकती है और हम स्वयं के बारे मे सही से जानते है तो आनेवाले समय को जितने के लिए पुरी ताकत लगा देते है तो हमारी यही समय हमारी मजबुरी नही बल्की हमारे लिए अवसर के रुप मे बदल जाती है। इस पुरी प्रक्रिया मे हमारे मन और तन को एक रेखिय गति संचालन कराने की विधा जाननी होती है। स्वयं से धटित होने वाली घटना हमारे नियंत्रण मे नही होती है हम घटना के नियंत्रण मे होते है। जब हम समय मे घटित होने वाली घटना की गहराई से परताल करते हुए सतत क्रियाशील रहते है तो हम समय के साथ होने वाली घटना को हल करने के लिए खुद को तैयार कर लेते है।
मजबुरी मे किया गया कार्य हमारी कार्य क्षमता को बहुत प्रभावित करती है। यदि हम कुन्ठा का शिकार हो गये तो आगे की राह ही बन्द हो जाती है। हम स्वयं को कोशने लगते है। हम भगवान के प्रति या तो आरुढ़ हो जाते है या विमुख हो जाते है। दोनो ही गति समय को धारा को आगे बढ़ने के साथ हमारी समझ को उन्नत बनाती है।
अपनी कमजोरी से सिखने वाले व्यक्ति कभी निराश नही होते है वो समय और अपनी कमजोरी को दुर करने के लिए कड़ी मेहनत करते है और सफलता के द्वार खोलते है। कभी-कभी इस भटाकाव को रोकने के लिए हमें गुरु का साहारा भी लेना परता है जिससे की आगे की रास्ता आसान हो जाता है। पुरी प्रक्रिया मे हम होते है इसलिए हमे भगवान से हर तरह के गुण प्राप्त है जरुरत है खुद को जगाने और अपने अंदर विश्वास जगाने की। इस विश्वास को क्रियांवित करने के लिए स्वयं को तैयार करते हुए आने वाली बाधा के साथ जुझने की। आपका विश्वास ही वो पुंजी है जो आपको आगे ले जा सकता है।
किसी घटना की आंशिक या सिर्फ अपनी सुख के लिए ही समझना या फिर उसके अन्य पहलु को नजरअंदाज करना हमारे लिए भारी पर जाता है। कार्य कुशल व्यक्ति समय और व्यक्ति की पहचान रखते है जिससे की उसके कार्य मे आने वाला अवरोध एक नयी दिशा बनाकर वो आगे निकल जाता है।
स्वयं को एक निश्चित वंधन मे वांधकर रखने तथा वदलाव को स्वीकार नही करने वाले को बाधा का समना करना परता है लेकिन साधना की शक्ति उसे खुद सबलता पाने के लिए सतत उत्साहित करती रहती है और वो देर सवेर आगे निकल जाते है।
मजबूरी किंकर्तव्यवुमुढ़ की स्थिति होती है जिसमे कार्यान्मुख व्यक्ति को अपने स्वार्थ के सीवा कुछ दिखता ही नही है यदि खुद दिखता भी है तो उसके लिए वो पहले से तैयार नही होते है। यदी तैयार हो भी गये तो किंतु परंतु लगा रहता है। इस तरह की समस्या सुख भोगी के लिए कठीन परिस्थिती का ज्यादा समाना कराना परता है।
मजबूरी से निकलने के लिए कोई आसान रास्ता को अपनाना आपके लिए नुकसानदेह हो सकता है क्योकि सफलता का कोई छोटा विकल्प नही होता है। अपनी कमजोरी को दुर करने मे लगने वाला समय हमारी खुशी को आने वाले समय मे गुणित करते रहेगा जो आज के उठाये गये गलत रास्ते से काफी अच्छा होगा।
कार्य वाधा को समझने के लिए धैर्य की जरुरत होती है। धैर्य हमारी आंतरिक समझ को जगाता है जो हमारी शारीरिक क्रियाविधी को तरंगित करती है जिससे की हम समय और परिस्थिती को अच्छी तरह से समझने के काविल हो जाते है और हम विकाश की यात्रा मे आगे निकल जाते है। ये वो ताकत है जो हमारी मजबूरी को हमारे लिए एक अवसर बना देती है।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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