उधार और सुधार

उधार और सुधार
उधार और सुधार

उधार लेने वाले बड़े ही आशावान प्रवृति के होते है। उनको ऐसा लगता है कि वर्तमान स्थिती से निकलने के लिए उसके एक मात्र सहारा आपसी सहयोग का उपयोग करके वो आगे निकल सकतें है।इसके लिए वो अपने सबसे विश्वस्त को खोजते है और उसमे से एक एक करके चुनाव करते है और अपनी स्थिती को मजबुत करने की असफल कोशीस करते है। उधार लेते समय उनकी विकाश की महत्वाकांक्षा प्रभावी रहती है लेकिन वो खुद को परेशानी से बाहर निकलन मे अपनाी जमा पुजी खर्च कर देते है जिससे उसके माली हालत मे सुधार नही होता है। जवकि उसकी आय के स्त्रोत पहले ही दैनिय स्थिती मे जा चुके रहते है। वर्तमान अवस्था से सिमित संसाधन मे रहने की उनकी व्यवस्था नही वनी होती है। जैसे ही उसके पास आमदनी शुरु होती है वे खुद को सामान्य बनाने मे लग जाते है। खुद के लिए सबलता हासिल करने के लिए उसके पास बहुत सारी महत्वाकांक्षा चल रही होती है। यहां उसके आमदनी कम और खर्च ज्यादा वाली कहावत चरितार्थ होती है।

उधार देने वाले को उसके वापस करने पर भरोसा तो होता है लेकिन वो उसके वारे मे ज्यादा सोचने की जगह खुद के पुराने अनुभव और आपसी रिस्ते की ज्यादा तरजीह देते है जिससे मामला और पेचीदा हो जाता है। उधार लेने वाले भी अपनी पुरानी व्यवस्था का सदुपयोग करते हुए अपने विश्वास मे जिते है और आगे बढ़ने की कोशीश करते है। हमने ऐसे कई लोगो से मिला जिन्होने अपने विश्वास मे उधार और सुधार को समझा। ऐसे ही एक किरान दुकनदार थे जिनेहोने अपने दुकान को 40 साल तक शहरी व्यवस्था मे चलाया जहां पर विध्यार्थी का आना जाना लगा रहता था। कुछ उधार लेने वाले लोग उधार चुकता किये तो कुछ उधार लेकर चलते बने। उनका मानना था की उसको इस प्रक्रिया मे काफी नुकसान हुआ लेकिन वो नुकसान की जगह अपनी आय को देखते है। वो कहते है कि मेरी विकाश की पुरी प्रक्रिया इसी से चलती है। अब वो पहले से ज्यादा सतर्क रहते है फिर भी यही कोई धोखा दे तो उसका वो सिख मे लेकर आगे निकल जाते है। उनका मानना था कि पुरी तरह से बंंद कर देंगे तो दुकान से होने वाली आय मे भारी कमी होगी जिससं हमारा वास्तविक विकाश रु क जायेगा।

एक ग्रामिन मे दुकान करने वाल् महीला ने अपने पुराने अनुभव से कहती है कि लोग जब अति विपन्नता की स्थिती मे होते है जो मानवीय आधार को मानकर वो उसको उधार देते है और समय पर चुक्ता करने को कहते है यदि नही किया तो वे मान लेते है कि इसको किसी न किसी रुप मे हमारा कर्ज चुकाना होगा। उनकी यही सोंच उसेक व्यवस्या को आगे बढ़ाती है। उनका भी मानना है इस कुछ मे चक्कर मे लगातार लेनदेन करने वाले भी प्रभावित हो जाते है। उनका मानना है कि अनुभव हमे सतर्कता सिखलाती है जो हमारे द्वारा अर्जित की हुई सम्मपती का हिस्सा है।

इक उधार देने वाले मेरे करीवी है जो ये जानते थे कि इस व्यक्ति की हालत बहुत दैनिय है ये रुपया वापस नही करेगा लेकिन वो बार-बार उसकी सेवा लेने के लिए उनके यहां आ जाता था जिससे उसको परेशानी होती थी और वौ ना भी नही कह सकते थे। उन्होने ये सोचा की उसको एक सम्मान जनक राशी उधार दि जाय तो ये व्यक्ति उस रुपया वापस तो नही करेगा लिकिन फिर मेरे सेवा लेने के लिए नही आ.येगा। इस घटना की अंत भी इसी कहाानी से हुआ। वो स्वयं को खुशी महसुस करता है क्योकि उसके सोचे विचार को ही ताकत मिली।

उधार और सुधार मे व्यक्ति को समझना परता है। हर व्यक्ति आपनाे आप मे अलग होता है। समाज मे रहने वाले लोग एक दुसर से जुड़कर रहते है और उसके पास एक दुसरे के उपयोग करते हुए आगे जाने की प्रबृति भी बनी रहती है और वो अपना व्यवहार भी उसी के अनुरुप करता है। इसी के साथ वो सिखता भी है। उधार लेने वाले का अंत तो अच्छा नही होता है लेकिन वो ततकालिक लाभ लेकर स्वयं को स्थिर रखने की कोशीश करते है। उनकी यही कोशीश उनको अपने के बीच नीचा गिरा देती है। उसका गिरता व्यवहार उसको सिमित दारये मे जीनो को मजबुर कर देता है।

कई लोग उधार लेने वाले के चालाकी मे फस गये। पहले तो उन्हने रुपया उधार लिये और दिये फिर उन्होने उधार लेने की अपनी राशी को बढ़ाते गये और अंत मे एक बड़ी रकम लेकर शांत हो गये। उनके विचार और व्यवहार इस तरह से वे उधार देने वाले के वांध दिया की वो ना नही कह सके और उनका उदार फिर वो नही दिया। कुछ उधार लेने वाले अपने रुसुख का उपयोग करते है तो कुछ लोग चालची सुदखोर लोग को अपना सिकार बनते है। हमने एक व्यक्ति को ऐसा भी देखा जो कहता था की जिसका उधार लिये उसको नही आपको हम क्यो नही देगें और वो फिर दिया नही। उसका व्यहार वड़ा ही व्यवस्थित होता है। इस तरह के लोग समय के साथ समाज मे अपनी एक पहचान बना लेते है जिससे उसको अपनी ही एक खास दायरे मे जीना होता है लोकिन उसकी प्रवृति उसको उसी दायरे मे खुश रखती है।

उधार और सुधार समझा कर नही सिद्द किया जा सकता है यो तो वि विधा है जिससे की ठेस लगने के बाद ही सिखा जा सकता है। उन्नती के तरफ जाने वाले के सोचने और समझने की शक्ति के साथ एक खास तरह के व्यवस्था होती है जिससे वो आगे बढ़ते जाते है लेकिन अवनति के तरफ जाने वाले सवको अपना विश्वस्त मान लेते है और विकाश कि सिढ़ी जल्दी चढ़ जाना चाहते है यही से उसके अवनती के दिन शुरु होते जाते है।

इस पुरी कहानी का विषय है हमे आगे बढ़ने के लिए व्यकि को पहचानना और उससे बचने के उपाय को जानते समझते हुए अपने जीवन को एक विशिष्च पहचान देना यही पहचान हमारी ताकत बनती है क्योकि ये ताकत ही हमे ओरो से अलग करती है। यही विशिष्टता हमे आत्मा को शकिति प्रदान करती है जो हमारे द्वारा अर्जित की हुई समपत्ती मे बड़ा स्थान ऱखती है। मानव को समझने की ताकत रखने वाले लोग वड़े ही मृदुल स्वभाव को होते है उसका सारा जीवन ही इसी म लगा रहता है। उधार लने वाले लोग तनाव ग्रस्त प्रबृति के होते है उसका सारा जीवन अपने को श्रेष्ठ सावित करने मे ही बीत जाता है और अंत मे अपनी अधुरी कहानी के साथ चल बसते है उसको इस बात का शिकायत रहती है कि काश कुछ अच्छा उनका जीवन सफल हो जाता।

समाज रुपी आईना मे अपना प्रतिविम्ब देखने वाले बहुत कम लोग होते है। जीवन साधा हुआा जीवन उनको संतुष्टी देता है। जीवन के अती गुढ़ हहस्य को समझने के लिेए ये कठीन रास्ते बहुत ही प्रेरक होते है और सतत सिखने और सिखाने के लिए सिंचित होते है। कहानी तो बदुत पर संदेश यही की उधार देकर स्वयं के अंदर सुधार करे और सतत आगे बढ़ते रहे किसी भी तरह के कुढ़ता से वाहर निकलने के लिए सतत प्रयत्नशील रहे।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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By sneha

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