देवी देवता

देवी देवता

परिचयः-

देवी-देवता का स्थान भारतिये समाज मे बहुत गहरा है। लोगो के भावनाओ के साथ इसका गहरा संबंध है। सामाजिक स्तर पर एक पुरा ढ़ाचा का बिकास हो गया है। इसमे लोगो की भावना कुट – कुट कर भरी हुई है। जिस समस्या का समाधान हम आसानी से खोज लेते है, अर्थात जो हमारी पहुँच के दायरे मे है, वहां तक हम अपनी बात को यथार्त के रुप मे मानते है। वैसे समस्या जिसका समाधान हमारी पहुँच के बाहर है और हम उसका हल अपने अनुसार चाहते है वहाँ देवी-देवता का स्थान आता है।

लोग इसे आस्था का बिषय भी कहते है। इसका मतलब होता है जिसका कोई समुचित आधार न हो तथा जो हमारी भावना की गहरी पैठ रखती है। आस्था को समझने के लिए हमे सामाज के अंदर जाकर उसका जड़ का पता लगाना होगा। लाभ हानि के समझ के बिच हम सभी समस्या का पुर्ण विश्लेषन करने की कोशीश करते है। जिसका समुचित विश्लेषन हम नही कर पाते है तथा उसका परिणाम हमे साकारात्मक चाहिए या मिलता है, उसे हम एक अद्वीतीय शक्ति के कारण हुआ मानते है। परिणाम वास्तविक होता भी और नही भी होता है लेकिन हमारा विश्वास यदि एक बार बन गया तो हम सभी समस्या के समाधान को अपनी समझ के सहारे देखने की चेष्टा करते है।

बिज्ञान की पहुँच को हम बास्तविक मानते है। लेकिन जहाँ अभी बिज्ञान नही पहुँच पाया और हमे परिणाम की व्याख्या करनी होती है वहाँ हम एक अद्वीतिय शक्ति के संचालन की बात करने लगते है तथा अपने मन के हिसाव से इसकी व्याख्या कर लेते है। समय के साथ इसमे बहुत परिवर्तन हुआ है और हो भी रहा है। लेकिन सम्पुर्ण सत्य को प्रप्त करना मानव के लिए संभव नही है और हमे भगवान की शरण मे जाना परता है। लोगो अपने समझ के हिसाब से इसका नामाकरन करते है। शिक्षित लोग मे नेचर या प्राकृति को ही इसका बरन मानकर हर समस्या के परिणाम की सटिक व्यख्या करते है। जाति धर्म स्थान तथा सामाजिक स्तर पर अनेको प्रकार के बिभिन्नता देखने को मिलता है।

यहाँ हम उत्तर बिहार मे सामाजिक स्तर पर प्रचलित देवी देवता के बिभिन्न मानताओ की एक-एक करके व्याख्या करेगे। हम आप तक इस लेख के माध्यम से सामाज मे होने वाली समस्या सामाधान तथा लोगों के बिच विश्वास की जड़ की परताल करेंगे। आप हमारे लेख को लगातार पढ़े तथा अपनी समस्या का समाधान खोजे। हम आपके समस्या सामाधान मे पुर्ण सहयोग करेंगे। यदि आप इसी तरह की किसी देवी-देवता की भावना का सामना कर रहे है तथा समय के साथ सही समाधान निकालने मे असमर्थ है तो हम आपकी मदद करेगें। हम सामाज के कई विशिष्ट लोगो के बारे मे बतलायेगो जो इस तरह की समस्या को हल करने मे महारत हासिल है। जिसकी पैठ समाज मे गहरी है।

लैजिकल आधार मानव मन को एक शस्कत हथियार देता है, जिसके आधार पर हम शुद्ध परिशुद्ध मे अंतर कर पाते है। यदि समय के साथ हमारा निर्णय सही होता है तो हमे अपने उपर विश्वास होने लगाता है। फिर यही हमारे बिकाश का आधार बन जाता है। तर्क शक्ति हमारे मन को एक ताकत देता है। हमारा अनुभव इसकी चेतना को जागृत करता है। जागृत चेतना हमारी दृष्टि को और पैनी कर देती है। हमारा लगाव गहरा हो जाता है।

समय के साथ होने वाले परिवर्तन तथा परिणाम की चर्चा हम करेगे जिसका जाँच का स्तर हमारी बैज्ञानिक समझ तथा तर्क के धरातल पर खड़ा उतरने वाला बिचार होगा। आपके मन मे यदि कोई बिचार आशंका हो तो आप हमे बतला सकते है। हम अपके बिचार को अपने लेख मे यथा स्थान देंगे।

नोटः हमारा यह लेख किसी की भावना को भटकाने तथा प्रभावित करने के लिए नही है बल्की सत्य की तलास है। जिसकी व्याख्या हम अपने समझ तथा स्तर से करेगे। जिसमे आपका साथ सराहनीय है।

बैज्ञानिक तर्कः- शोध और अनुसंधान के द्वारा जिस बिषय को हम स्थपना कर देते है तथा जिसको कोई उस प्रमाणिकता के आधार पर कभी भी तथा कहीं भी सावित कर देता है तो उसे बैज्ञानिक प्रमाणिकता का आधार मिल जाता है। देवी देवता का सामाजिक आधार अनुभव होता है, जिसकी व्याख्या व्यक्ति अपने समझ के हिसाब से करता है जिसको बिज्ञान पुरी तरह से नाकार नही सकता है, लेकिन यदि बिज्ञान को सावित होने के कसौटी पर नही उतरता है तो हम इसको समय के साथ समझने के लिए कहकर छोड़ देते है। समय के साथ हमें कई चौकाने वाले जानकारी मिली है जिसका हमे पहले अंदाजा लगाना भी मुश्किल था।

होना तथा अनहोनी के पिछे कुछ न कुछ कारण जरुर होता है। इसके व्याख्या के आधार मे संयुक्तता समय के साथ बनने लगता है तथा एक ससक्त सामाजिक आधार बन जाता है। जिसमे हमारी समाज के बिकाश की बिचारधारा छिपी रहती है। समय के साथ हमे इसे ही साबित करते की कोशीश करते है। किसी व्यवस्था को स्थापित होने मे लगने वाला समय प्रकृति के साथ समायोजित होकर मुल्यवान बन जाता है। ऐसा देखा भी गया है कि इसको बाद मे मान्यता भी मिली है। यह बिचारधारा तबतक चलती है जबतक की कोई इसको प्रमाणिकता के साथ रद्द न कर दे।

देवी देवता का सामाजिक ढांचाः

मानव अपने दिर्ध सोच के द्वारा जिस बिचार धारा को स्थापित किया है उसका ढ़ाचा भी हमारी व्यवस्था से ज्यादा भिन्न नही है। शक्ति संतुलन को स्थपित करने के लिए एक छोटे छोटे ग्रुप को एक बड़े ग्रुप मे समाहित होना होता है। ऐसा ही जान परता है दैविक व्यवस्था का आधार। पहले व्यक्तिगत तैर पर देवी देवता के प्रति व्यक्ति का रुझान होता है। यह रुझान समय के साथ उसके आस्था को दृढ़ कर देता है। किसी भी समस्या के साथ उसका मनोभाव जुरने लगता है तथा एक मजबुत आधार पा लेता है। इसके बाद इस भाव को कुल देवता के रुप मे सथान मिल जाता है। व्यक्ति को ऐसा लगने लगता है कि उसके बिकाश की बास्तविक धारा यहीं से निकलेगी। कुल देवता के स्थापना के बाद नगर या गाँव या कसवा के लोगो के समुह के द्वारा भी एक बिचार को जगह मिल जाता है तथा एक सामुहिक बिचार धारा के आधार पर इसकी भी स्थापना हो जाती है। इसको नगर डिवहार कहा जाता है। इसके प्रति मानता है कि यह नगर को कही अदृश्य शक्ति से होने वाले हमला से रक्षा करता है। या यूँ कहें तो कोई असमाजिक तत्व किसी खाश बिचार के साथ यदि गलत का आधार बनाकर किसी का अहित करेगा तो इसको नगर देवता रोक सकता है। एक नगर को दुसरे नगर की रक्षा का प्रहरी माना जाता है।

मान्यता तथा सामाजिक बिषमता के आधार पर देवी देवता के कई सक्रिय ग्रुप काम कर रहे है। उसके मान्यता का आपना ही आधार है। हमने अनुभव किया है कि व्यक्ति की अपनी समझ उसके परिवेश के हिसाब होता है। यदि कोई बिचारधारा वहां पुष्पित और पल्वित हो रहा है तो वह देर सवेर उसका हिस्सा बन जाता है। यही से देवी देवता का बिस्तार होता है।

शहरी जीवन तथा खानाबदोश जीवन मे इसका स्थान भाव प्रधान अधिक होता है लेकिन शन्य स्तर तक नही होता है। ज्ञानी लोगो के तर्क शक्ति के कारण कई तरह के पैराणिक बिचारधारा टुटने भी लगी है। आगे निकलने की चाहत व्यक्ति को कभी कभी इसके मान्यता को मानने पर बिवस भी कर देता है।

यहां हम भारतीय समाज मे स्थापित दवी देवता के वारे मे बिचाधारा को संकलन करेगे तथा इसके गणित को समझने की कोशिश करेगें। हमे यह पता चलेगा की देवी देवता का सामाजिस आधार क्यो इतना मजबुत है। सफलता और असफलता की कसौटी को गढ़ने वाला बिचार का आधार हमारा मन ही है जिसका ठौर हमे परिवार से मिलता है जो एक सामाज का इकाई है।

भारतीय सामाजीक ढ़ाचा के देवता का वर्गीकरणः

  • नगर देवी या देवता
  • व्रहम
  • देश के देवता
  • बिशिष्ठ देवता

विशिष्ठ देवता के रुप मे मंदिर बाले देवी देवात आते है, जिनका स्थान स्थानिये विश्ष्ठ देव भावना के आधार पर होता है। कुछ विशिष्टता की आकांक्षा होती है तो इसकी आराधना की जाती है। इस तरह के देवी देवता की शक्ति को नगर स्तर पर तथा इसके उपर के विशिष्ट प्रभाव के रुप मे जाना जाता है।

कुल-देवताः-

कुल देवता का स्थान परिवारिक लेवन पर सर्वोत्तम है। परिवारीक स्तर पर दैविक सुऱक्षा का पुरा प्रभार इसे के उपर होता है। कुल देवता हमे परिवारिक सुरक्षा का गारंटि देता है। लेकिन इस व्यस्था को समुचित रुप से पाने के लिए। हमे एक नियम बद्ध नियम का पलन करना होता है। नियम सभी जगह एक समान नही है लेकिन कुछ खास तरह के नियम को सभी मे प्रमुखता से लागु होता है। भारतीय समाज मे कुल देवता की पुजा पाठ शिक्षित तथा अनपढ़ दोनो तरह के लोग करते है लेकिन दोनो के मान्यता मे समानता होती है। यदि कोई अंतर होता है जो परिवारी स्तर पर होता है जिसका प्रभाव कुल देवता के मान सम्मान को प्रभावित करता है। हम इसके मान सम्मान से होने बाले कष्ट के साथ इससे जुड़ी मान्यता की भी चर्चा करेंगे।

कुल देवता कई तरह के है। इस देवता का एक अपना सिस्टम यानी तंत्र होता है। और व्याख्या के साथ कहे तो इनकी एक पुरी ईकाई होती है जिसमे कई तरह के देव शक्ति का जुड़ाव होता है।

कुल देवता के प्राकरः-

  • काली बन्दी
  • बन्दी गोरैया
  • कारीख
  • बन्दी सोखा

इनकी पुजा कुल देवता के रुप मे की जाती है। इनका नामाकरण इनके परिवार मे प्रमुख सदस्य के नाम पर की गई है। बन्दी माता तथा काली माता के नाम से इनके परिवार को जाना जाता है। अन्य देवता गण का नाम पजियार, देवी, तथा अन्य सदस्य होता है। पजियार को पुजा देने वाले व्यक्ति के परिवार का ओ सदस्य होता है जो अपने जीवन काल मे देव शक्ति की पुजा अर्चना की हो तथा मृत्यु के बाद ओ पुजा के अधिकार मे आ गयो हो। पजियार का स्थान पुजा के पात्र पाने वाले प्रमख देवता के दुसरे स्थान पर आता है। इसकी पुजा व्यक्तिगत परिवार के साथ बदलने लगती है। जब  कि प्रमुख देवता वही रहता है।

कार्यः-

इनका कार्य पुजा देने वाले परिवार की पुर्ण सुरक्षा होता है। पुर्ण आंतरिक सुरक्षा से मेरा तातपर्य है कोई दुसरे दुष्ट आत्मिक शक्ति के प्रभाव को रोकना इनमे उपस्थित सदस्य हमला करने बाले दुष्ट आत्मा को रोकते है। विपत्ति के काल में जब मन कलुसित रहता है, तब अत्मा का ज्वार प्रवाण चढ़ने लगता है। जिसके बाद प्रभावित लोग इनको याद करते है। तथा अतिरिक्त पुजा की मान्यता करते है। जिसको समय पर दे दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि भक्त कि पुकार से देवता की शक्ति मे प्रखरता आती है। तथा देवता को कार्य के समाधान मे तेजी आती है। लेकिन आत्मिक प्रभाव के कारण दुख तथा प्राकृतिक कारण से होने से दुख मे अंतर होता है। आत्मिक प्रभाव से होने वाले दुख शुरुआती समाधान आसान होता है लेकिन समय बितने के साथ इसका प्रभाव शारिरिक होने के कारण बचाव मुश्किल होता है।

देवीः-

इनका स्थान पजियार के बाद का होता है जो माना जाती है कि दैविक समस्या आने पर समान प्रकृति वाले देवता को कार्य समाधान मे लगाया जाता है जिससे इसका होना सुनिश्चित होता है।

पुजा स्थलः-

    पुजा स्थल व्यक्तिगत परिवार के घर मे होता है। परिवार को अलग होने के बाद लोग पुजा स्थल भी अलग कर सकते है या होने वाले वार्षिक पुजा मे अपना भाग देकर अपना कार्य पुरा करते है। पुजा घर का चुनाव व्यक्ति खुद करता है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि घर वैसा हो जिसमें समान्य आवागमन कम हो। पुजा स्थल के पवित्र जगह मे घर के एक कोन को रखा जाता है। घर का कोन समान्यतः पुरब दिशा के तरफ का दिहिने तरफ वाला होना माना जाता है। ख्याल रखाना चाहिये की यह कोन किसी दुसरे प्रदुशित प्रकार के अन्य घर के कोन से सटा ना हो।

पुजा सामाग्री-

  पुजा समाग्री का चुनाव में लगभग एकरुपता देखने को मिलता है। पुजा समाग्री मे दुध का खिर मुट्ठा या गुड़ वाला, दाल वाला पुरी, लड्डु चिनी वाला, गुरुहुल का फुल, केला का पत्ता, चिकनि मिट्टी, पित्तल का लोटा।

पुजा का समयः-

   पुजा का समय अर्धवार्षिक होता है यानि छः महिने मे एक बार। समान्यतः यह कार्य शनिबार को सान्धया से शुरु होता है। तथा पुजा होने तक चलता है।शनिवार को बैरागन का दिन कहा जाता है।

 परिवारीक शोक के समय पुजा वर्जित है। यदि परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो पुजा रुक जाती है। परिवार मे यदि किसी बच्चे का जन्म हो तो पुजा रुक जाती है जब तक की छः दिन पर होने वाला कार्य संपादन न हो जाये।

पुजन विधिः-

    पुजा होने वाले दिन मे पुजा करने वाले अधिकृत व्यस्क व्यक्ति पुजा के होने तक किसी प्रकार का भोजन ग्रहन नही करता है। उनका भोजन पुजा के समाप्ति के बाद ही होता है। ऐसी महिला जिनका मासिक का समय हो पुजा विधि मे किसी प्रकार से भाग नही लेती है, जबकि पुजा के बाद पुजा का प्रसाद खा सकती है। पुजा मे  लगने बाला पुरा समाग्री की तैयारी कुछ दिन पहले कर ली जाती है। पुरा समान सिर्फ पुजा के लिये ही तैयार किया जाता है। तैयार सामाग्री को पुजा के दिन नया चुल्हा या वैसा चुल्हा जो सिर्फ पुजा के लिए ही इस्तेमाल हो सही माना जाता है। पुजा सामाग्री बनाते समय किसी साफ सफाई का पुरा ख्याल रखा जाता है। छोटे वच्चे को इस स्थल से दुर रखा जाता है। सरसो तेल मे दाल वाला पुरी को तैयार किया जाता है। खिर को बनाने के लिए भी एक अलग वर्तन का इस्तेमाल किया जाता है जिसका उपयोग भोजन मे नही किया जाना चाहिेए। केला के छोटे पत्ते पर एक पुरी तल मे जिसपर खिर रखा जाता है तथा बांकि 10 पुरी को वगल से रखा जाता है। एक पुरी को उपर से रखा जाता है कुल मिलाकर 11 पुरी का इस्तेमाल किया जाता है। फिर 5 गुरुहुल के फुल को एक पंक्ति मे रखा जाता है। 5 चगह पर अलग से 5 पुरी रखकर उसपर खिर डाल दिया जाता है। पुजा को पुजा स्थल वाले घर के वाहर भी किया जाता है। यहां पर हनुमान जी की पुजा की जाती है। हनुमान जी को पुजा मे लड्डु का इस्तेमाल किया जाता है। हनुमान जी की धजा भी दी जाती है। धाजा का बदलाव साल मे एकमबार ही होता है।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

By sneha

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