
तेरे द्वारे
भक्ति भाव मे विहल मन को जब मनवांक्षित फल नही पाता है जो वह उद्दीग्न हो जाता है फिर मन की अपनी ही गति परिलक्षित होने लगती है। भक्त लगातार अपने मन पर नियंत्रण की कोशिश करता रहता है। इन्ही कोशिश मे उसे लगता है कि उसको किसी सहारे कि जरुरत है तो वह अपने आराध्य की ओर ध्यान करता है। अपने आराध्य की ध्यान को अपनी ओर करने के लिए वह स्वयं की भाव भंगिमा मे वशिभुत कर लेता है जिससे की भाव प्रधान मन की उदिग्नता शरीरिक रुप सज्जा मे विघटित होकर एक उन्नत विचार को जन्म दे और उसे कुछ नया सिखने का मौका मिले।
अपने शांत स्वभाव को एक परिचायक परिधान मे ढालकर जब ओ अपने आराध्य के पास पहुँचती है तो उसका पुरा ध्यान खुद से हटकर अपने आराध्य के की ओर चला जता है। अब उसका मन अपने आराध्य के प्रति पहले से ज्यादा शसक्त हो जाता है जिससे उसके विश्वास को एक नयी गति मिलती है। यह गति उसके उदात्त विकाश के लिए एक जरुरी उपांग के रुप मे परिलक्षित होता है जो मन को एक स्थिर चितन मे बाध देता है।
यह भाव प्रधान वंधन ही व्यक्ति की ओ व्यवस्था है जिसमे व्यक्ति स्वयं के अंदर निहित चाहत को एक गति प्रदान करता है। विकास के मार्ग मे बनने वाली इस तरह की भावभंगिमा पुर्ण व्यवहार उसे कुछ नया समझने बुझने के साथ खुद को व्यवस्थित करने के लिए ज्यादा उपयोगी सावित होता है।
हर अदा एक विश्वास का भाग होता है हर विश्वास एक मनोदशा होती है हर मनोदशा एक विचार का निर्मण करती है। एक समग्र विचार जब एक नये रुप को धारण करता है तो पुरी परीदृश्य ही बदल जाती है। अब पुरी तस्वीर ही एक दृष्टी म नजर आ जाती है। फिर मन की गति को समझना आसान हो जाता है। जब आसान राह पर मन निकल परता है जो शांत चित मे सबकुछ अपने नियंत्रण मे करने की क्षमता भी पहले की तरह व्यवस्थित हो जाती है।
यदि हम स्वयं को इस तरह की व्यवस्था को समय समय पर अपनते रहे तो हमारा कल्याण होना निश्चित है। हम अपने को समझने के लिए जो यथेष्ट प्रयास करते है वही हमारी विकाश की दिशा तय करती है।
भक्त भगवान का यह प्रसंग हमे जीवन मे कठीन चुनौतीयो को सामना करने के लिए प्ररित करता है साथ ही एक व्यवहारिक और उन्नत चितन को जन्म देता है। हमारा विकाश की दिश भगवान के आशिर्वाद के रुप मे हमारे साथ चलती है। हम इन्ही भावो मे आगे चलते जाते है और हमारा भागोद्य का सुन्दर चित्रण भी हमारे साथ चलते रहता है।
भगवान के दवारे जाने और उनके प्रणाम करने करने का जो मौका हमे मिलता है उसे हम स्वयं के अंदर एक चेतना को जगाकर खुद को तरोताजा करने के लिए उपयोग करते है। हमारे जीवन की हर खुशी नन्ही भावो के साथ मिलती रहे हम इसकी कामना करते है। आशा करते है भगवान के द्वार पर जाने को कोई भी प्रयोजन क्यो न हो एक सुखद संदेश लेकर ही भक्त लौटता है क्योकि उसका विश्वास उसे टटस्ठता प्रदान करती है।
भगवान आपके द्वारे आने वाले अपने भक्त की रक्षा करना तथा उसकी हर मनोकामना पुरी करना जिससे जीवन को उपयोगी बनाने मे अपके सहयोग की गाथा गायी जा सके। जय हो दिव्य शक्ति।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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