संस्कृत दिवस

संस्कृत दिवस
Oplus_131072

संस्कृत भाषा बहुत पुरनी भाषा है। वेदों मे इस भाषा का जिक्र है। वाल्मीकी रमायण की रचना भी संस्कृत मे की गई है। संस्कृत की भाषा पहले सहज थी। लोगो को इस भाषा को बोलने के लिए सिखाया जाता था। बहुत सारी बातों को एक छोटो स्वरुप मे बनाकर बोलना ज्यादा गुणकारी माना जाता था। इस भाषा का व्यापक असर देखने को मिलता है। पुरा बैदिक काल इस भाषा को लेकरके उच्च स्तर की ज्ञान के प्रकाश को फैलाया था।

 आजकल भी मंत्र की शक्ति को संस्कृत भाषा के जरीये ही प्रयोग किया जाता है। इसका कारण बहुत सारी बातों को संक्षिप्त मे कहने के साथ छंद के रुप मे व्यक्त करने से इस भाषा की खुबसुरती बनती है। इस भाषा को बोलने के लिए इसके टुटे फुटे प्रयोग से भी बचने की जरुरत है। कालांतर मे भारत मे बहुत सारी भाषा का विकास हुआ लेकिन किसी भाषा ने इतने व्यापक असर समाज पर नही डाला जितना ब्यापक असर संस्कृत का रहा। संस्कृत भाषा का विकास ही जीवन को उच्च शैली मे ढ़ालने के लिए किया गया था। गुणकारी लोग पहले शिक्षा ग्रहण करते थे फिर भौतिक जीवन शुरु करते थे।

आजकल का जीवन पहले भौतिक विचार से ही शुरु होता है। जैसी तैसी भाषा के प्रयोग के साथ हम बड़े होते है जिससे की हमारे सोचने की क्षमता का हास होता है। भाषा जीतनी सुदृढ़ होगी दिमाग को उतना ही उन्नत भाव समझ आयेगा। आज का भारत अपने चहुमुखी विकास के लिए लगातार कोशीश कर रहा है इसका कारण इसके भाषा की विबिधता है जिसके कारण लोगो के बीच विचार और संबादहिनता का असर देखने को मिलता है।

संस्कृत भाषा को आज बिज्ञान भी उन्नत शैली माना जा रहा है। इस भाषा के उपर आज भी लोग अध्ययन करते है। भारत सरकार भी इस भाषा को जीवित रखने के लिए इसके उपयोग को प्राथमिकता दि जा रही है। इतने भाषा के बिकास के बाबजुद आज भी मंत्र शक्ति को संस्कृत मे ही बोला जाता है। इस भाषा को सिर्फ बोलने तक ही सिमित नही रखा गया बल्कि इसकी गहराई के भी परिभाषित किया गया है। इसलिए इस भाषा का व्यपकता इतना गहरा असर देखने को मिलता है।

किसी भाषा को सिर्फ बोलना ही काफी नही होता है। बल्की हर भाव का प्रकटिकरण करने के लिए उपयुक्त शब्द का होना भी जरुरी है। इस तरह के व्यवस्था से व्यक्ति एक दुसरे के साथ व्यापक तौर पर जुड़ सकता है। भाषाल की उच्चता उसके भाव को समझने मे है। संस्कृत भाषा इस विचार के धनी है जो जीवन को सजाते हुए उच्च समझ को समझने मे मदद करती है।

प्राचीण काल मे श्रावण पुर्णीमा को गुरुकुल मे बोदो के शिक्षण की सत्र से शुरुआत होती थी। ऋषि मुनियो को संस्कत साहित्य का आदि स्त्रोत माना जाता है। इसलिए इसे ऋषि पर्व भी कहते है। संस्कृत भाषा की गौरव, इसके प्राचीन साहित्य, बैज्ञानिक स्वरुप और महत्व के प्रति लोगो को जागरुकता बनाने के लिए ही 28 अगस्त के दिन को खास बनाया गया है। संस्कृत भाषा को आज भी बढावा मिलना चाहिए। इसको सहज और अनुकरणीय बनाने के लिए विधिवत प्रयास किये जाने चाहिए जिससे की पुरानी विरासत को उच्चता प्रदान किया जाय़।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

संबंधित लेख को जरुर पढ़ेः

  • प्रसारण को भाव की अभिव्यक्ति का अच्छा स्त्रोत माना जाता है।
  • न्याय के लिए सतत प्रयासरत रहने की जरुरत है जिससे की न्याय सही से मिले।
  • कौशल विकास के लिए गहराी से अघ्ययन के साथ उसके प्रशिक्षण की भी जरुरत होती है।
  • विकास के लिए हमेशा नयी सोच की जरुरत होती है।
By sneha

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!