
परमाणु परिक्षण के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस़ ( International Day against Nuclear Tests)
अणु स्तर की जानकारी तक तो युद्ध पारंपरिक विधी से होता था। लेकिन जब व्यक्ति की पहुँच परमाणु स्तर की हो गई तो युद्ध विध्वंशक हो गया। परमाणु के साकारात्क उपयोग से तो मानाव विकाश की बातो सही थी लेकिन बात अब एक बड़े स्तर की हो गई है तो विश्वंशक की बात हो जाती है। विनाश की इस स्थिती का आंकलन हिरोशिमा और नागाशाकी पर गिराये गये परमाणु बम से लगाया जा सकता है। यहां पर भारी जान माल की हानी हुई थी। एक लम्बे समय तक लोग अपंग बनते चले गये।
महा विध्वंस ने लगो मे विस्वास जगाया की परमाणु बम के उपयोग की बाते बंद होनी चाहिए। इसके लिए परमाणु परिक्षण पर रोक की बात जोर शोर सो चलने लगी। बहुत देश आगे बढ़कर इसमे भाग लिये जिसमे सबसे बड़ा नाम जापान का था जिसने परमाणु बम के प्रहार को झेला था। बांकी के बहुत देश थे जो इसके समर्थन मे थे। लेकिन कुछ देश अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की आपुर्ती के लिए चोरी छीपे इसके पिछे लगे हुए थे। कुछ देश को परमाणु बम बनाने मे कामयावी मिली तो बैश्विक स्तर पर हलचल बढ़ने लगी।
वैश्वीक खीचतान के बीच बढ़ती बैश्वीक प्रतिस्पर्धा ने एकाधिकार को कम करने के तरफ आगे बढ़ने लगी। इसके बाद आपसी रणजीश की बाते सामने आने लगी। तो आंतरिक सुगबुगाहट तेज हुई। इस प्रक्रिया के बाद बैश्वीक तनाव का माहौल बना। इसके बाद फिर परमाणु बम बनाने की होर लगने लगी। इसके बाद से समस्या और बिकराल हो गई। दो महाशक्ति के बीच टकराव होगा तो विसात बिछेगी ही। इस आपाधापी के बीच कई देश परमाणु बम के होर मे आगे निकलने की सोच रहे है। इसमे जापान के साथ कई और देश परमाणु बम की दौर मे आगे आने लगे है।
वैश्वीक तनाव यदी कम होगा तो माहौल मे बदलाव होगा और लोग शांती के साथ जीवन यापन पर जोर देंगे। इसके लिए प्रयास करने की जरुरत है। व्यक्तिगत स्वार्थ से बाहर निकलकर इस कार्य को करने की जुरुरत है जो ऐसा नही दिख रहा है। इसके लिए जितने भी प्रयास हुए नाकाफी सावित हुए है। उम्मीद का दामन थामे है और प्रयास अब भी जारी है।
लोगो को 29 अगस्त के दिन की खास महत्व को देखते हुए परमाणु परिक्षण रोकने के तरफ कदम बढाने बाले को समर्थन की जरुरत है जिससे की कार्य को अच्छाई से जोड़ा जा सके। सबके सहमति और प्रयास से ही विकास की दौर पुरी होगी और ये संकल्प पुरा होगा।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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