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भुक्खड कहीं का

भुक्खड कहीं का

भुख्खड़ कहीं का भुक्खड कहीं का आजकल के आपाधापी जिन्दगी के भागमभाग मे उलझन भी कम नही है। धर्म के घटने से आसुरी प्रबृति जन्म लेने लगी है। बेलगाम बिज्ञान रुपी धोड़े की चाभी उडण्डों के लग गई है, जिसमे मानव मुल्यो का चितन ही नही है। हर बस्तु को बिकाऊ मानकर बजार मे उतार रहा है। अमुल्यवान बस्तु भी हांफने लगी है कि कही उसका भी दाम न लग जाये। यदी ऐसा हुआ तो उसे भी बाजार की प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। प्यार मोहब्बत के नाजुक रिस्तो भी मौज मस्ती का साधन बनते जा रहे है। टुटते बनते…
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Good Morning Nature

Good Morning Nature

हे प्रकृति आपका जय हो। आपको समझकर ही आज मानव अपनी बिकाश यात्रा को आगे बढ़ा रहा है। सुर्य की गति धरती पर जीवन को नियंत्रित करता है, क्योकि उर्जा के वितरण का एक मात्र नियमित स्त्रोत यही है। प्रभात के साथ ही जीवन का बिखराव होने लगता है, तथा सुर्यास्त के साथ ही जीवन सिमटने लगता है। यह बिखरना और सिमटना हमारे दैनिक जीवन का भाग बन गया है। हम इसका अभ्यस्त हो चुके है। इसलिए हम इससे आगे सोचते है। यह सोच हमे प्राकृत से अलग कर देती है। हम यहां स्वयं की आवधारना के सोच को लेकर…
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सत्य कहां मिलेगा

सत्य कहां मिलेगा

सत्य कहां मिलेगा लेख सत्य के खोज मे निकला व्यक्ति वस्तुतः स्वयं को ही खोज रहा होता है। स्वयं को व्यवस्थित करने के लिए वह अपना राह तलास रहा होता है। भटकाव का कारण गुण की प्रखरता का नही होना होता है। गुण के प्रखरता मे कमी होने के कारण उसका समायोजन सही से नही होगा। जिससे की उसके सम्मान मे कमी होगी। इसी कमी को पुरा करने के लिये उसको तोड़ जोड़ करना परेगा। इससे उत्पन्न व्यवस्था मे वह उलझता चला जायेगा। उपलब्ध परिस्थिती का लाभ लेता वह इस कदर उलझ जायेगा कि एक दिन वह स्वयं को खोजने…
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