
हवा का झोंका
यूँ तो रिस्तो मे रुठने मनाने का क्रम जारी रहता है। लेकिन यदि बात साधारण सी हो तो इसका सामाधान जल्दी निकल आता है, लेकिन यदि कोई गंभीर मुद्दा का सामना करना पड़े, तो इसके समायोजन मे समय के साथ-2 मानसिक व्ययाम भी करना पड़ता है। एक दुसरे के प्रति लगाव रखने वाले यदि स्वयं के प्रती वफादार होते है तो समाधान का निकालना सुनिश्चित रहता है। चाहत की गाठें बिकर्षण को घटाने का कार्य करती है इससे समझ का दायरा बढ़ने लगता है और परिस्थिति एक दुसरे को मिला देती है।
करीव आने मे यदी स्वाभिमान आड़े आयो तो भी इसका समाधान निकल जाता है। लेकिन यदि चाहत के समाधान का दुसरा समाधान भी हो तो पुरी प्रक्रिया संदिग्ध बनी रहती है। प्रस्तुत काव्य लेख मे इस घटना का वर्णन किया गया है। नाराजगी की शुरुआत तो गहरी है, लेकिन समय के साथ आपसी लगाव का दायरा बढ़ने के कारण आपसी विचार विनिमय शिथिल पर जाता है जिसको सुधारने मे समय लगता है।
रुठे के मान जाने के बाद क्या सब कुछ पहले जैसा ही हो जायेगा या कुछ बदलाव आयेगा इसी आशंका को दर्शाता यह काव्य लेख एक रोचक प्रसंग देता है। विवाद की गहराई को समझने के बाद यह आशा रहती है कि विवाद जिस कारण हुआ उसका साकारात्मक परिणाम मिलना चाहिए। यदि नाकारात्मक रुझाण मिलता है तो खुशीयां कम हो सकती है। यदि कार्य योजना निष्ठा के साथ बनाई गई हो तो परिणाम साकारात्मक होते है और पहले से समझ की गहराई बढ़ जाती है।
भाव पुर्ण प्रसंग को व्यक्ति घटना के बाद यदी बारीकी व्याख्या करता है तथा सही समय पर सही निर्णय लेता है तो वह स्वयं को उर्जावान बनाये रखता है। इसमे आशा की किरण प्रवलतम शिखर पर होती है। पुरी प्रक्रिया एक प्यार का नोंक – झोंक है, जिसमे एक दुसरे को समझने का भरपुर मौका मिलता दिख रहा है। सामान्य जीवन मे होने वाली घटना का व्याख्या तथा उसका एहसास हमे सबलता प्रदान करता है। यह काव्य लेख हमे यथेष्ठ बनायेगा जिससे की हम घटना का पुर्व मुल्यांकन करने मे सामर्थवान सावित होगें।
आपका कल्याण हो इसकी कामना हमे सदा रहती है। आप बाधाओ से निकलने के गुड़ जानकर एक योगपुर्ण शक्ति प्रवल व्यक्ति के रुप मे आकर सामाज के सामने एक आदर्श बने इससे बड़ी खुशी हमारे लिए क्या हो सकती है। गुणकारी भाव को सिर्फ समझने से नही वल्की उसको सही समय पर सही रुप से इस्तेमास करने की जरुरत होती है।
रिस्तो मे रुठने मनाने का सिलसिला तो चलता ही रहता है। लेकिन अपनी गलती का एहसास कर उसे सुधार लेना तथा पुनः स्थिर होकर कार्य संचालन करना एक कला है। होता तो ऐसा भी है कि सामने वाले के प्रती अपना प्यार जताने के लिए प्यार का थपेड़ा भी लगाना पड़ता है। इस नोक झोंक मे हमे एक दुसरो को समझने का मैका मिलता है। इस समय मे सही से संतुलन बनाना होता है कि कहीं किसी की भावना को ठेस न पहुँचे। हमारी सावधानी हमारे प्यार के गहराई को बढ़ा देता है। प्यार का स्थान हमारे भावना मे होता है। इसे शरीर मे खोजने वाला जीन्दगी भर भटकता रहता है। वह अपनी छुद्धा की तलाश करता हुआ इतना आगे निकल जाता है कि वहां से सुरक्षित लौटना शायद संभव भी न हो। इसलिए प्यार को अपने हृदय की गहराई मे महसुस कर समुचित समाधान निकालना है। भुख के बाद शान्ती तथा शान्ती के बाद भुख इसके सिलसिले मे यदी बन जाये प्रखर धुप तो छांव की तलाश के बजाय एक दुसरे को कोसना सही नही है। समझ के साथ कार्य और कार्य की समझ रिस्तो मे गहराई लाती है।
अपना अधिकार मानकर कार्य संपादन करने की कला का अपना एक अलग ही रोमांश है जो समय के साथ घटने लगता है। लेकिन व्यहार के साथ सामंजस्य स्थापित करके आगे बढ़ने वाला व्यक्ति सही समय से साथ सही न्याय कर दुसरे का आदर्श बन जाता है। यहां पर अपनी गलती का एहसास करती हुई याचिका एक नये रुप मे वापस आती है जो प्यार के गहराई को गहरा कर गई है।
काव्य की रचना की दृश्टि से एक उत्साहित रचना है जिसमे मन के भटकाव तथा आपसी लगाव का स्पष्ट कलात्मक एवं काव्यात्मक रुप से चित्रन किया गया है। काव्य पाठ की सार गर्भिता को समझना कठिन नही है वल्कि हमे रोमांचित कर जाता है।
“हे मानव प्यार के अनन्त गहराई के पार जाना संभव नही है, तुम तो वही करो जो कर सकते हो फल तुम्हे आहलादित करता रहेगा। इसके मुल्यांकल के बजाय स्वयं को सशक्त करो तुम्हारा भाव भंगिमा खुद बनने लगेगा और तुम अपने को प्यार के ज्यादा गहराई मे पाओगे।”
“हे मानव, बिवेकी व्यक्ति कभी शिथिल नही पड़ता उसकी चेतना उसको जगाती रहती है। यदि भटकाव होता भी है तो तेजी के साथ निराकरण का सामाधान निकालकर वह आगे निकल जाता है। तु भी बिवेकी बन जिससे जीवन यात्रा मे एक लम्बा ठहराव न हो। यह योग तुम्हे सामान्य जीवन से उचाँ उठा देगा। तुम अपने कल्याण का मार्ग स्वयं निकालने की ताकत पा जाओगे। जिससे तुम्हारा व्यक्तित्व प्रकाशित होकर दुसरो के लिए प्रेरण स्त्रोत बन जायेगा। तुम्हारा कल्याण हो।”
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लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु
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