भक्त हनुमान

भक्त हनुमान

भक्ति की परमानन्द को पाने वाले भक्त हनुमान को भक्त शिरोमणी भी की संज्ञा दी जाती है। भगवान की भक्ति की महीमा के गाने वालों मे हनुमान का नाम सबसे ऊपर आता है। हनुमान जी ने अपने लिए भक्ति के सिवाय कुछ नही चाहा। यही गुणकारी भाव उनको समस्त जीवो से ऊपर ले गया।

दीन-दुखियो को मदद करना भारतीय बिचारधारा की धरोहर रही है। इसी धरोहर के भाव को जिवंत रुप हनुमान जी ने दिये जिसके कारण हम उन्हे भगवान की संज्ञा भी देते है। भक्त के रुप मे उनकी गाथा हम गाते है तो हम उन्हे जगाते है। हम उन्हे बुलाते है। हमारे सामने जो दृश्य बनता है उससे हमारे भाव की तारतम्यता गुणित होने लगती है और हम अपने आराध्य को सामने पाते है। फिर हमारी कामना के अनुरुप ही हमे ज्ञात प्राप्त होता है और फल की हमारी अंतिम इच्छा भी पुरी हो जाती है।

भारतीय संस्कृति मे भक्तो की कमी नही है एक से बढ़कर एक भक्त हुए है जैसे गुरु भक्त आरुणी, एकलव्य, बालक ध्रुव, प्रहलाद, महाभारत के अर्जुन आदि अनेको नाम है, लेकिन किये गये कार्य के रुप मे भक्ति को सिर्फ चाहने वाले भक्त हनुमान जी की उपमा सबसे ऊपर है।

समय की धुरी चलती जा रही है लेकिन हनुमान जी की भक्ति और शक्ति मे कोई कमी नही हुई है। इसका कारण उनके भक्ति के प्रति अनन्य भाव का होना ही है। मानव सामाज के वे दुर्गुण जिसपर पुर्ण रुप से बिजय पाना आज भी कठीन कार्य है भक्ति के मार्ग मे बाधक बनकर खड़े हो जाते है। सुख की कामना को आगे लाकर चलने वाला जीव परोपकारी कार्य को कैसे करे। यदि परोपकारी हो भी तो स्वयं के लिए क्या चाहे। यह चाहत ही हमारी उज्जवल भविश्य के निर्माण की पुजी है। यदि चाहत ही सेवा हो तो और क्या बचता है। बचता है वो गुण जिससे सेवा के कार्य संभव हुआ और यही भाव मानव समाज को हमेशा उत्प्रेरित करता रहेगा। क्योकि सेवा से जो जीव को आनन्द प्राप्त होता है उसका पारितोषिक तो उसका गुणगान ही बच जाता है, क्योकि यदि सेवा करने वाले कुछ न मांगे तो गुण गुणित होकर फैलेगा ही।

हे भक्त शिरोमणी आपने जो स्थापित किया इसका मुल मंत्र जो भी रहा हो लेकिन मानव समाज को यह संदेश मिल ही गया की सेवा अगर करनी हो तो निःस्वार्थ करो। मन को निश्छल रखो। अपने आंतरिक भाव को दवाओ नही बल्की सबको बताओ। तुम उपने सेवक की गाथा को दुसरे से सुनो जिससे की ये पता चले की तुम्हारा किया गया सेवा की उच्यता कितनी है। यदि यह भाव आज सभी जीव अपना ले तो धरती पर स्वर्ग को पा ले, क्योकी कामना की पुर्ती होता देख मन तरंगित होगा और वह परमानन्द को पा जायेगा।

कौन भक्त, कौन भगवान यह समस्या तो हठी के लिए मुश्किल पैदा करता है, लेकिना सामन्य जन तो आंतरिक भाव से ही समझ जाते है। हमारे समाज और दिव्य शक्तियां भी इस तरह के भाव वाले को किनारा कर देते है जिससे वह अपने जीवन समय मे ही इसका जबाव पा लेता है। शक्ति निश्चल होता है उसके उपयोग करने वाले ही इससे पहचाने जाते है कि उसने इसना उपयोग कैसे किया। शक्ति की पराकाष्ठा और मानव कल्याण ही भक्ति का मुल मंत्र है।

आपकी सेवा करने वाले भक्त को भक्ति प्राप्ती होती है जिससे वह गुणकारी बन मानव समाज की सेवा मे लग जाता है तथा अपने लिए बदले मे कुछ नही चाहता वह आज भी पुजा के पात्र हो जाते है। लोगो का प्यार भी उसे मिलता है। सुख की कामना करने वाले दुख से डरते है यही डर उन्हे किर्ति से गिरा देता है। लेकिन जो सेवा भाव जगाता है वह सदा ततपर रहता है कि हमे सेवक का प्यार प्राप्त हो जाये और इसके लिए क्या किया जाय। वह तो कर्य को खोजकर सेवक से आज्ञा पाकर कार्य मे लगा जाता है। सेवापाने वाले निःस्वर्थ सेवक को देखकर जो अहलादित भाव जगाता है वही भाव सेवा करने वाले का फल होता है। सेवक के मुख से जाने अनजाने मे उनके किये गये परोपकार के प्रति श्रधा का भाव जो आता है उससे समाज मे सेवक का यश फैलता है।

हे गुणकारी भक्त हनुमान सेवा की मुत्यू तो हो ही नही सकती है। आज जो आपसे प्रेरणा लेकर सेवा के कार्य मे लगकर स्वयं के प्रती कुछ नही चाहते वह आपको प्राप्त हो जाते है। वह मानो कामना रहीत होकर डर को तो भूल ही जाता है। वह स्वयं भी अपनी सारी आवश्यकता को हंसते खेलते पुरा कर लेता है। जो कार्यशिल है भगवान उन्हे ही शरीरिक उन्नति का बरदान देते है जिससे वह रोग व्याधि से मुक्त रहता है, तथा आनन्दित जीवन का शाश्वत आनन्द लेता है। उसे पाकृति की सुषमा बहुत भाता है। कृतिमता का वास उसे आनन्दित कर ही नही सकता क्योकि वह तो कामना का मार्ग छोड़ चुका है। हे प्रभु आपकी महीमा आज जागी है, क्योकी आज आपका जन्मदिन है। यह भाव समस्त जीव मे पहुँचे यह हमारा भी प्रयास है।

आज जिन्दगी को मुल्यवान समझने वाले कम हो गये है। स्वयं को प्रभुत्वशाली के रुप मे स्थापित करने को लेकर, राक्षसी प्रबृति को अपनाने मे आमदा है। मानव मुल्यो का जीतना भी हनन हो लेकिन उनकी व्यक्तिगत प्रभुसत्ता कायम हो, यह प्रबृति ही आपसी बिवाद को जन्म देती है। घात प्रतिधात के बिच ठहरने वाला खुशी बहुत छनीक होते हुए भी शक्तिशाली होता है क्योकि व्यक्ति सुख का श्रोत बाहर खोजता है। इस उलझे बिचार मे वह स्वयं उलझ कर अपनी जीवन समाप्त कर देता है साथ ही मानव के बिच एक कहानी छोड़ जाता है, जिसका इतिहास मुल्यांकन कर उसे सजा सुनाता है। जो समाज के लिए एक उपदेश बनकर समाज मे चलने लगता है।

हे मानव भक्ति का विज्ञान बहुत ही अनुठा है। इसको समझने के लिए गहन अध्ययन की जुरुरत है। समान्य मन मे इस बिचार तरंग को व्याखित करना संभव नही है। आप यदी भक्ति के गहराई मे गोता लगायेगे तो पायेगे की पाकृति को समझकर उसका लाभ उठाने के लिए उसके सानिध्य मे रहकर ही उसको महसुस कर सकता है। जो आप समझ पाते है वह आपकी पुंजी बन जाती है। आपके द्वारा किये गये कार्य के सफलता की महत्ता बढ़ा जाती है। इसलिए इस कार्य को आज ही शुरु करते हुए परम भक्त हनुमान जी की श्रद्धा के पात्र बन जाओ। जय हनुमान।

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लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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By sneha

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