खुशी और प्यार

प्यार एक दूसरे को समझने का बंधन है जिसके सहारे खुशियों को उच्च स्थान प्राप्त होता है। बंधन हमारे स्वभाव जनित संबंध को दर्शाता है। इसकी गहराई हमारे सक्रियता पर निर्भर करता है। समय के साथ यदि इसमें बदलाव होता है तो खुशियां भी कम या अधिक हो जाती है।
आजकल के व्यवसायिक सोच ने संबंधों को भी प्रभावित करने लगा है। जिससे खुशियों को बनाए रखना एक गंभीर चुनौती बन गई है। सीमित अवधि वाला खुशी यदि जोखिम भरा भी ही तो कई लोग आगे निकल जाते है जिससे की उसमे प्यार की अवधारणा बदल जाती है। यह बदलाव यदि बढ़ता है तो लोगो में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। यही भ्रम विचलित करते हुए कई खुशियों को निगल भी जाता है।
जीवन वास्तविक खुशी संबंध को लंबे अवधि तक बनाए रखने में है, जिससे की विपरीत परिस्थितियों का सामना दृढता से किया जा सके और अपनी खुशी भी सलामत रहे।
भावना के प्रवाह में बहे बिना कार्य को करते रहना अगर चुनौती है तो बंधन की मजबूती भी इसी में है और सही खुशी भी। आइए एक बेहतर समाज निर्माण का हिस्सा बनते हुए अपनी खुशी को गुनीत करते रहे और रिश्तों की डोर प्यार से बंधी भी रहे।
लेखक एवं प्रेषक :: अमर नाथ साहू
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