विश्व दृश्य-श्रव्य विरासत दिवस

विश्व दृश्य-श्रव्य विरासत दिवस

विरासत हमे पुराने समय से जोड़ते हुए नये समय के मुल्यांकन के बारे मे सचेत करता है। हमारे सोचने और समझने की शक्ति बालापन से शुरु होता है जहां पर विवेक शुन्य होता है और युववस्था मे पहुँचता है जहां पर विवेक बहुत उन्नत होता है। यहां से हमे जानकारी सहेजना होता है और फिर उस जानाकारी के आधार पर कुछ नया करने के विचार को प्रतिपादित करत हुए आगे जाना होता है। यहां सिखने की प्रक्रिया को और गहराई से समझने की जरुरत है इसके लिए पुराने अनुभव को समझना जरुरी हो जाता है।

यदि पुर्व जन्म की बात को समझ भी ले तो वर्तमान समय मे सबकुछ नया हो जाता है। पुराने समय की यदी यादें बची भी है तो उसका परिशेधन होना मुश्किल होता है। हां इतना तो होता है कि बुद्धी की तिक्ष्णता पुर्व जन्म के कर्मो के आधार पर घटती बढ़ती है। जबकि वर्तमान ही श्रेष्ठ होता है। विरासत मे सहेजे गये मुल्यावान बस्तू मे सुनाना और देखना बहुत महत्व की बस्तू होती है। पहले हस्त लिखित अभिलेख हुआ करता था। इसके बाद चित्र की कालाकारी से भी समझा जा सकता है।

वर्तमान समय मे चलचित्र आ गई है जिसमे आवाज और चित्र कि गति दोनो है। यदी हम पुराने डाटा को वैसे ही छोड़ दे तो वो खराव हो जाते है। समय के साथ मास्चुराईजर इसको प्रभावित करता है। इसके लिए पुराने डाटा को नये डाटा मे बदलने की जरुरत होती है जिससे की पुरानी विरासत का बाचाव होता रहे। जैसे-जैसे तकनिक विकसित हो रहे है उत्तम व्यवस्था का आना जारी है। समय के साथ बितने वाले पल को फिर से याद करने के लिए वर्तमान समय के अनुरुप व्यवस्था को अपडेट करने की जरुरत होती है। यदि पुराने व्यवस्था मे ही छोड़ दिये जाय तो वर्तमान मे उसको सहजता से देखना संभव नहीं होगा। इसके लिए लगातार व्यवस्था को सही करने की जरुरत है।

पुराने व्यवस्था मे बहुत कम लोग कुछ सिखते है जबकि आने वाली पिढ़ी को इसके प्रति उसकी उत्सुकता बहुत रहती है जिससे की उसके अतित के बारे मे पुरी जानकारी मिलती है जिससे की उसके सोचने के मनोभाव मे बदलाव आता है। उसका अतित उसके कार्यबल को जागृत करता है। जिससे की उसको कार्य करने की क्षमता मे विश्वास के गुण का विकास हो जाता है। आवाज फोटो के साथ ऑडियो विडियो को भी सहेजने के लिए सार्थक प्रयास चलते रहने चाहिए तथा समय के साथ उसको नये व्यवस्था मे स्थानांतरिक करने की जरुरत है।

27 अक्टूबर के खास दिन को इसी विचार के लिए उपयुक्त माना गया है। स्वयं के साथ आनेवाले पिढ़ी को भी इस जागरुक व्यवस्था का हिस्सा बनते हुए इस व्यवस्था को भी उच्च रखना जरुरी है।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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By sneha

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