इंटरसेक्स जागरुकता दिवस ( Intersex Awareness Day )
इंटरसेक्स को समझने के लिए नर और मादा के प्रकृति को समझना होगा। इसके समझ से ही एक दुसरे के प्रति आकर्षण के गंभीरता को समझा जा सकता है। इसको समझते हुए जीवन को सर्वच्यता प्रदान करने के उत्तम उपाय को भी समझना जा सकता है। इसकी बिभिन्न पहलुओं को गहराई से समझना होगा जिससे की एक नियम बद्ध तरीके के साथ जीवन के हर बाधा को पार किया जा सके।
मानव के स्त्री और पुरुष यानी की नर और मादा जीव जगत के सारे प्राणी से अलग है। मानव को छोड़कर जितने भी जीव है समान्यतया उसमे प्रजनन की खास प्रक्रिया होती है जिसके लिए उन्हे साल के कुछ खास दिन ही सक्रिय रहना होता है। इसके बाद उसका कामवसना जागृत नही होता है। महीला मे उसको इसट्रस साईकिल कहते है। जवकि मानव मे इसको मेन्सट्रअल साइकिल कहा जाता है। ये एक बार शुरु होकर 50-55 बर्ष की उमर तक चलता है।
महिला मे मासिक की शुरुआत 9-15 वर्ष की आयु मे होता है। इसकी शुरुआत होते ही शरीर मे कई तरह के बदलाव शुरु हो जाते है। इस बदलाव मे आवाज का मधुर होना, कांख और गुपतांग मे बाल का होना तथा स्तन का धिरे-धिरे बिकास होना शुरु हो जाता है। इस बदलाव के लिए प्रोजेस्टेरोन और स्ट्रोजेन हार्मोन का स्त्राव शुरु हो जाता है। शुरुआत कुछ दिन तक मासिक अनियमित रहता है इसके बाद मासिक की प्रक्रिया सही हो जाती है।
पुरुष मे शुक्राणु का बनाना 10-12 वर्ष की आयु मे शुरु हो जाता है। इसके बाद से लगातार शुक्राणु का बनना जारी रहता है। टेस्टेस्टेरोन के बनने से शरीर के मे कई तरह के बदलाव शुरु हो जातें है जैसे आवाज का भारीपन होना, कांख और चेहरा तथा गुपतांग मे बाल का होना शुरु हो जाता है। पुरुष मे शुक्राणु के बाहर निकलने की प्रक्रिया स्वप्न के जरीये होता है या कुछ लोग हस्तमैथुन का भी उपयोग करते है।
दोनो सेक्स को एक दुसरे के प्रति आकर्षण का गणित प्रकृतिक रुप से ही तय होता है। महिलाये जहां शर्मीली होती है वही पुरुष आक्रमक होते है। दोनो अपने व्यवहार से पहचाने जाते है। ये वो उम्र होता है जहां पर काफी समभलकर कदम उठाना होता है। कामवसना की प्रचंडता कई लोगो को अपने रास्ते से भटका देती है जो उसके विखराव का कारण बनता है। जो खुद को संभालकरके अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होते है उसका भविश्य उज्जवल होता है।
कामवसना की इक्क्षा व्यक्ति को अच्छा देखने के लिए प्रेरित करता है। इसमे उसके अच्छे कपड़े पहनना और अधिक अच्छा दिखने के लिए प्रयास करना। कामवासना की बातों पर ज्यादा गहराई से अभिरुची रखना आदि सामिल है। आजकल के इंटरनेट की दुनिया मे अश्लील दृष्य देखना भी सामिल है। इसमे यदि हस्तमैथून की आदत लग जाती है तो उसका बुड़ा असर उसके दिमाग पर पड़ता है। उसके दिमाग मे तुनिकमिजाजी होना, चिड़चिड़ा होना, चित का स्थिर नही रहना, मन नही लगना तथा कमजोरी महसुस करने जैसी समस्या का सामना करना परता है।
दिमागी रुप से व्यक्ति ज्यादा चंचल होता है। रंगो और बिपरित लिंगो के प्रति लगाव उसके आवभाव को बदल देता है। इसको सोचने की शक्ति भी बदल जाती है। कामेक्षा की प्रचंडता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका बातावरण कैसा है। एकाकीपन उसको अच्छा लगता है जहां पर वह घंटो एक ही विचार मो खोया रहता है। उत्तेजनशिता की स्थिती इतनी उच्च हो जाती है कि बिपरित सेक्स के कपड़ो से भी कामोत्तेजना जागृत हो जाती है और स्खलन तक कि क्रिया हो जाती है। इसको नियंत्रण करने की जरुरत है जिससे की कार्य क्षमता का विकास सही से हो सके।
इस उम्र मे सही दोस्त का होना जरुरी है जिससे की उसकी मानसिक स्थिती को नियंत्रित किया जा सके और उसका वास्तविक विकास हो सके। यदि एक बार गलत कार्य की मनोदशा बन गई तो उसके मानसिक स्थिती खराव हो जाती है। उसके सोचने की शक्ति काफी प्रभावित होती है। दिमाग का स्थिर नही रहना, कहीं मन न लगना, कई तरह के अव्यवहारिक विचार भी आने लगते है। हालत यहां तक बिगर जाती है कि कई तो अपनी जीवन को ही समाप्त कर देना चाहता है। इस तरह की स्थिती मानसिक बदलाव के बाद आता है। इसको रोकने के लिए व्यक्ति का बातावरण को बदलना जरुरी हो जाता है।
बदलते परिस्थती मे जिस तरह से कामवासना की उग्रता बढ़ती जा रही है उससे कई तरह की विषमता का सामना करना परता है। इसमे सबसे ज्यादा प्रभावित व्यक्ति का अपना लक्ष्य होता है। जिस उम्र मे जीवन सवारना होता है उस उम्र मे प्यार की प्रचंडता उसको अपने आगोस मे ले लेता है और एक अलग ही दुनिया मे वो जीने लगता है। इसको रोकने के लिए जनजागरुकता जरुरी है। ये समझना होगा की जब कामवासना जागृत होती है तो सिखने की कार्य क्षमता की भी प्रचुरता होती है। यदी कामवसना कम हो जाती है दो सिखने की कार्य क्षमता मे भी कमी आ जाती है। इसलिए संयम और नियंत्रण के साथ जीवन को आगे ले जाने की जरुरत है।
26 अक्टूबर का खास दिन इसी विचार को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विशेष बनाया गया है जिससे की एक सुंदर जीवन को संयमित और रुपांतरित करते हुए जीवन लक्ष्य को पाया जा सके और एक बेहतर कल का निर्माण हो सके। प्राकृति का काम है जीवन को जारी रखना इसके लिए ही सेक्स का निर्माण किया गया है। एक उच्च कोटी की जीवन के विकास के लिए ही सेक्स की इस बिधा को प्राकृति ने बनाया है। घटते अध्यात्मिक जीवन मुल्यों के कारण सेक्स ही एक सुख का साधन बनते जा रहा है जिससे मानव के व्यवहार बिकृत हो जा रहा है। इसको रोकने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर पहल करने की जरुरत है जिससे की एक बेहतर कल का निर्माण हो सके।
लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु
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