अपनो के प्रीत

अपनो के प्रीत

अपनो के प्रीत

अपनो के प्रीत बहुत गहरा होता है। जब हम कुछ दिन तक साथ रहते है तो एक दुसरे के साथ व्यवहार के साझा आदान प्रदान से अवगत हो जाते है। इसके साथ ही हम एक दुसरे के और करीव आने की कोशीश करते है कि सामने वाला उत्तम व्यवहार करेगा जिससे की आपसी रिस्तो को एक नई उचाई मिलेगी। इसके साथ ही विकाश तथा विश्वास की एक नयी उड़ान को पाया जा सकेग। इस तरह के सोच मानव के स्वभाव का हिस्सा होता है। लेकिन स्वार्थ परक व्यक्ति बड़ा ही जटील होता है। वह अपना आंतरिक प्राकृति के उपर एक आवरण लगाया रहता है क्योकि वह सामने वाले के मनोदशा को भांफते हुए अपने एक रणनित पर कार्य कर रहा होता है जवकि हम उसे एक समान्य उतकृ्ष्ट व्यक्ति मानने कि भूल करते है। यह भुल करना भी हमारी प्रकृति का ही हिस्ता होता है क्योकि हमारा स्वभाव स्वार्थी नही है। इस गुणात्मक पहलु के कारण ही उलझन की समस्या उत्पन्न होती है। लेखक इसी समस्या को रेखांकित किया है और इस तरह के लोगोे से सावधान रहने की जरुरत को समझाने कि खोशिश की है।

व्यक्ति को पहले जांचने और परखने की जरुरत है । उसके मन मे क्या चल रहा है। उसका उदेश्य क्या है। वह कहां तक एक उपयुक्त व्यक्ति हमारे लिेए सावित होगा। कभी – कभी ऐसा होता है कि हमारे पास समय नही होता है और कार्य का भार आधिक होता है और हम इस कदर उलझे रहते है कि हमे खुद का भी सुध नही रहता है ऐसे समय मे अपने निकट करीवी को कार्य भार सौप देते है। उसके उपर हमारा विश्वास चाहे जैसा भी हो वह समय के परिवर्तन के हिसाव से अपना कार्य आरम्भ कर देता है और एक खास रणनिति मे कामयाव हो जाता है। सयम के साथ वह कार्य करते हुए बाहर निकल भी जाता है। यही पर अफसोस होता है कि कास हम थोड़ा सजग होते तो ऐसे परिस्थिती से बचा जा सकता था।

तर्क युक्त वात को समझते हुए कार्य की गति का निर्धारण करना एक कला है इसका समायेजन नियत समय मे नही वल्की पहले से करना चाहिए। इस बात का ख्याल रखना चाहिए की आने वाला समय कितना खास होगा और उस समय मे कैसा प्रयास होगा। जब भी समय मिले तभी सवेरा के वात को उपनाते हुए कार्य को करना चाहिए जिससे की हमारा नुकशान ना हो। अपने के प्रित से जुड़ी जानकारी भरी बाते को जो सिखकर आगे निकलता है वह जीवन जीतकर एक विजेता के रुप मे आगे बढ़ता है उसका ही गुणगान होता है। जो समय को नही समझ सकता है वह अपना नुकसान करते हुए सिखता है पर सिखता है जरुर क्योकि विना सिखे उसका आने वाला समय और भी खराव जाता है। अपने बुरे दिन से बचने के लिए उसे सिखना होता है। इसके लिए हमे विचार के व्यवहार के साथ उत्तम व्यवहार को जानना जरुरी है।

कहते है भरोसा बाजार मे नही विकता है यानी की भरोसा को बनाना परता है यह व्यक्ति का आचार धर्म होता है। उसकी इसी गुण के कारण उसकी प्रतिस्ठा बनती है। जिसको की प्रतिस्ठा का प्रवाह नही है उसको स्वयं के साथ एक समझौता करना परता है जो है जौसा है सब ठीक है तो फिर बात वही रुक जाती है। लगातार होते अपसगुण से उसका भी जब समय बिगर जाता है तो फिर वर सोचता है कि मेरे साथ ही ऐसा क्यो होता है। यहां यही वजह है की वह अपने जीने की कला को नही सिखा। वल्कि सिखने के समय को वह सही तरह से समन्वय नही किया। यहों अपने के प्रित से सावधान रहने की जरुरत है जिससे की एक सुखद और आनन्दायक जीवन को जीया जा सके।

लेखक एवं प्रेषकः अमर नाथ साहु

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By sneha

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