चौरचन

चौरचन

गणेश चतुर्थी यानी की चौरचन का पर्व अपने बच्चे को दिर्धायु बनने के लिए किया जाता है। इससे एक रोचक कहानी जुड़ी हुई है जो समाज मे व्याप्त अपयश को दुर करने के विचार को शक्ति प्रदान करता है। कहा जाता है कि एक दिन भगवान गणेश अपने मुसक वाहन पर अपने कैलाश पर घुम रहे थे। उसको देखकर चन्द्रमा को हंसी आ गई। अपना उपहास को देख गणेश जी को आत्म गलानी महसुस हुई। गणेश जी इस व्यवहार को अनुचित मानते हुए चन्द्रमा को शाप दिया कि इस दिन जो अपको देखेगा उसको कलंक का समाना करना परेगा। इसके बाद चन्द्र को अपने गलती का एहसास हुआ तो चन्द्र ने गणेश जी से क्षमा प्रार्थी हुए तो उन्होने कहा कि इस दिन जो आपको पुजन करेगा उसे इस दोष से मुक्ति मिल जायेगी।

भद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विवाहित महिला के द्वारा मनाये जाने वाला यह भारतीय त्योहार है। इसके गणेश और चन्द्रमा दोनो की पुजा की जाती है। चन्द्र देव को दही, फल आदी के साथ विभिन्न पकवानो से अर्ध्य दिया जाता है। इसमे आत्म शुद्धी के साथ कुश धारण किया जाता है। कुश को आयुर्वेद मे मुत्र संवंधी, बावाशीर, वात पीत, शुगर और त्वचा रोग को दुर करता है। आत्म शुद्धी को भी योग मंत्र से शुद्ध किया जाता है। इस दिन ग्रहिय स्थति के अनुसार यदि सामान्य रुप से चांद दर्शन किये जाते है तो नाकारात्मक प्रभाव पर सकता है। इसलिए चंद्र दर्शन से मना किया गया है। एक खास समय और विधि को ध्यान मे रखकर चन्द्र दर्शन की व्यवस्था बनाई गयी है। जिससे कि जीवन मे शुभ योग बनता रहे।

विवाहिता स्त्री को वहां के परिवार और समाज दोनो के व्यवहार को समझते हुए आचरण करने परते है जिससे कि उसका गुणकारी भाव सवको अच्छा लगे, जीवन मे सुचिता का विकाश हो। कुछ ऐसे भी परिस्थीती आती है जब कुछ व्यवहार, कुछ लोगो को अच्छा नही लगता है और वो हंसी का प्रात्र बना देते है जिससे की उसकी मनहानी होती है। इससे बचने के लिए सावधान रहने की प्रेरणा दी गई है। हंसी का पात्र बनाने वालो को भी सावधान रहने की गुणकारी भाव को समझाया गया है।

विज्ञान की भाषा, ग्रहीय स्थिति की योग और समाजीक व्यवहार मिलकर एक साथ ही धार्मिक प्रयोग की व्यवस्ता बनकर शुद्धता को परिभाषित करती है। इस तरह यह धार्मिक अनुस्ठाण सभी प्रकार से उपयोगी है। स्वास्थ्य और मनोभाव के साथ समाजिक परिस्थिती से अवगत होकर उच्च भाव को आत्मसात करते हुए एक योग्य वयक्तित्व के निर्माण की नीव रखी गई है। नारी का मन बड़ा ही चंचल होता है। उसको समय और परिस्थिती के हिसाव के सभी व्यवस्था को जांचना और समझना होता है तभी परिवार के सभी सदस्य को एक वंधन मे रखा जा सकता है। इसके लिए ही पर्व त्योहार के बनयाा गया है। इसके तहत खास विचार के सभी लोग आत्मसात करते है जिससे परिवारिक संस्कार का विकास होता है।

भारतिय उन्नत समाज के विकाश मे इस तरह के पर्व त्योहार का बड़ा ही महत्व है जिससे समाज को एक सशक्त जीवन पद्धती को अपनाकर एक उच्च आदर्श को कायम किया गया है। इतनी वारीकी से समाज के हर विधा को उसके व्यवहार मे पिरोया गया की लोग एक उन्नत व्यवस्था मे ढ़लते चले गये और विकाश की उन्नत व्यवस्था बनती गई। जब हम व्यवहार अच्छा करते है तो हमारा विकाश भी अचछा होता है। ज्ञान की वास्तविक अवधारना भी यही कहती है कि ज्ञान से हमारा व्यवहार उच्च होना चाहिए इसके लिए आचरण जरुरी है। भारतिय समाज को यही गुणकारी भाव मिला है।

गणेश चतुर्थी का ये त्योहार हर तरह से गुणकारी है की जो संयम और नियमन को एक सुत्र मे पिरयोकर हमे जीवन के उच्च आदर्श को अपनाने की प्रेरणा देता है। आशा है कि आने वाला हमारा समाज और उन्नत होगा और जीवन की हर वाधा को पार करता हुए एक नए नवीन उन्नत व्यवसाथा के साथ आदर्श स्थापित करेगा। सभी को गणेश चतुर्थी की हार्धिक शुभकानाएं।

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

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By sneha

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