15
Aug
तेरे द्वारे भक्ति भाव मे विहल मन को जब मनवांक्षित फल नही पाता है जो वह उद्दीग्न हो जाता है फिर मन की अपनी ही गति परिलक्षित होने लगती है। भक्त लगातार अपने मन पर नियंत्रण की कोशिश करता रहता है। इन्ही कोशिश मे उसे लगता है कि उसको किसी सहारे कि जरुरत है तो वह अपने आराध्य की ओर ध्यान करता है। अपने आराध्य की ध्यान को अपनी ओर करने के लिए वह स्वयं की भाव भंगिमा मे वशिभुत कर लेता है जिससे की भाव प्रधान मन की उदिग्नता शरीरिक रुप सज्जा मे विघटित होकर एक उन्नत विचार…