रक्षा बन्धन

रक्षा बन्धन

रक्षा बन्धन

मानव मन बड़ा चंचल होता है। वह परिस्थिती को जल्द ही भाफ लेता है। फिर एक भाव भंगीगा बनाता है। कमजोर चतुर के मकर जाल मे ऐसा उलझ जाता है, कि बिना बाहरी सहायता के वह बाहर निकल ही नही सकता है। जितना वह जोड़ लगाता है उतना ही उलझता जाता है। यह रक्षा सुत्र का बनधन तभी काम आता है, जब आत्म बिश्वास भी खतरे मे पर जाता है। रक्षा सुत्र का यह संयोग मकर जाल को काटकर व्यक्ति की स्वतंत्रता को बहाल कर देता है। प्यार का ये बन्धन एक धागे के समान हमारे रिस्तो को बनाये रखता है।

प्राकृतिक संसाधन की सिमित होने के कारण इसकी सुरक्षा भी जरुरी है। इसलीए एक रक्षा सुत्र हमे इनसे भी बांधवाना चाहीये। जिससे की आने वाला हमारा आगला पिढ़ी ज्यादा खुशहाल रह सके। हमे धन्यवाद करें, कि हमने उनके अधिकार की रक्षा की।

मुतृभूमि की रक्षा करना भी जरुरी है, जिससे की मानव के रहने के लायक यह धरती बनी रह सके। इसके लिए एक रक्षा सुत्र हमे इससे भी बन्धवाना चाहिये। हमें यह याद दिलाने के लिए की हमे इनकी कितनी जरुरत है। स्वर्थ के कारण जो हम कर रहे है, उसके रोकने का सुगम मार्ग है।

राष्ट्र के साथ हमारा व्यक्तिगत हित भी जुड़ा होता है। आजकल हम ऐसे कई उदाहरण देख चुके है जिसमे की हारने वाले राष्ट्र के लोगों को कितनी किमत चुकानी पड़ती है। यदि एक रक्षा सुत्र राष्ट्र के नाम का हम बान्धवाले तो हमारा अहित करने वालो को संदेश चला जायेगा, कि हम राष्ट्र के प्रती कितना सतर्क है। समय आने पर हम यह सावित करते भी रहे है, आगे भी यह प्रयास जारी रहे। यही हमारी कामना है। इसी भाव को हम अपनी कविता मे व्यक्त कर रहे है। आपके कोमैंट का इंतजार रहेगा, कि हम अपने प्रयास मे कहां तक सफल रहे। जय रक्षा बन्धन

लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु

By sneha

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