


भगवान भोलेनाथ को जल प्यारा है। शुद्ध जल को व्यवस्थित तरीके से भगवान को जलाभिषेक के बाद मन में शीतलता का भाव आता है। कहते है की जब भागीरथी के कठोर तप से गंगा स्वर्गलिक से धरती पर अवतरित हुई थी तो उसके तेज धार को रोकना संभव नहीं था। तब भगवान शिव ने अपनी जटा में गंगा को समेट कर मानव कल्याण के लिए गंगा की निरसित किया था।
बहती जल धारा जीव जगत के लिए जीवन का आधार है। बहुत सारे पशु पक्षी अपना प्यास बुझाने के लिए बहता जल का ही उपयोग करते है। बहता जल आपने साथ कई तरह के तत्व को आगे ले जाता है। यह शुद्दी को बनाता हुआ आगे बढते जाता है। भगवान को यही बहता चल चढ़ाया जाता है। यह जल भगवान को अती प्रिय है। गंगा जल मे शुद्दी करण के गुण का प्रमाणीकरन भी हो गया है। भोगवादी मानव को जल की महत्ता का एहसास भगवान के प्रति उनके जलाभिषेक से गुणित होते रहता है। गर्मी मे शितल जल सुकुन और शांती देता है। जीवन विकाश भी जल से ही हुआ है। मानव शरीर का आधिकाश भाग जल ही है। हमारे धरती पर भी आधिकाश भाग जल है। इस तरह जल की महत्ता वहुत है। इसके उपयोग को समझना होता है।
जल की शीतलता मन को शांती देती है। गुणकारी जल को भगवान को अर्पण किया जाता है तो मन के अंदर जो भाव बनते है, उसका प्रतिविम्ब हमारे जीवन पर परता है। इसी भाव को इस काव्य लेख मे दर्शाया गया है। जल के गुणकारी भाव को समझकर जीवन को सुधारने का जो प्रण लिया जाता है उससे जीवन में एक नयी उर्जा का संचार होता है। जिससे हमारे जीवन में आनेवाले चुनौती के सामना करने का ताकत बढ़ जाता है।
भाव ही वह तथ्य है जो हमारे जीवन में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए हमे नियमित रूप से प्रेरित करते रहता है। इसको हमेशा सुदृढ़ करने के प्रयास करने परते है। जीवन मे उत्पन्न होने वाले वाधा से जो हमे सिख मिलता है उससे भाव का नवीकरण होते रहता है। लेकिन चेतना को जगानेवाला भाव जल के अर्पण से जिस रूप में हमारे पास आता है वह एक अद्वितीय है। एक समग्र चिंतन का भाव जीवन को सही तरह से स्थापित करने मे मदद करता है।
पावन गंगा की धारा को धरा पर लाने के जो भाव हमारे जनमानस मे है उससे समस्त जीव के कल्याण का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यह भाव हमारे सोच को एक उचाई प्रदान करता है। भोगवादी समाज मे एक उच्च आदर्श को स्थापित करता ये भाव जीवन की उच्चता को दर्शाता है। आज जल को लेकरके जो भाव बनाये जा रहे है हमारे पुर्वजो ने ये भाव पहले ही उध्रित कर दिये है। त्याग और सेवा भाव से जिस समाज का निर्माण हुआ है वह आज भी सवके लिए गुणकारी है.
लेखक एवं प्रेषकः- अमर नाथ साहु
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